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	<title>आलेख &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>परिवार को महाभारत नहीं, रामचरितमानस बनाएं : रामचरितमानस कर्तव्यों के पालन और त्याग की गाथा महाभारत में &#8216;अहंकार&#8217; प्रधान </title>
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		<pubDate>Fri, 15 May 2026 11:21:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आज के दौर में बढ़ते पारिवारिक बिखराव को देखते हुए यह विचार आवश्यक हो गया है कि हम अपने घरों को कुरुक्षेत्र बनने से बचाएं। महाभारत और रामचरितमानस दो विपरीत जीवन-दृष्टिकोणों के दर्पण हैं। आज पढ़िए, अभय जैन &#8221; अकिंचन के यह विचार&#8230; आज के दौर में बढ़ते पारिवारिक बिखराव को देखते हुए यह विचार [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आज के दौर में बढ़ते पारिवारिक बिखराव को देखते हुए यह विचार आवश्यक हो गया है कि हम अपने घरों को कुरुक्षेत्र बनने से बचाएं। महाभारत और रामचरितमानस दो विपरीत जीवन-दृष्टिकोणों के दर्पण हैं। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, अभय जैन &#8221; अकिंचन के यह विचार&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>आज के दौर में बढ़ते पारिवारिक बिखराव को देखते हुए यह विचार आवश्यक हो गया है कि हम अपने घरों को कुरुक्षेत्र बनने से बचाएं। महाभारत और रामचरितमानस दो विपरीत जीवन-दृष्टिकोणों के दर्पण हैं। जहाँ महाभारत अधिकारों की जंग और विनाश का प्रतीक है, वहीं रामचरितमानस कर्तव्यों के पालन और त्याग की गाथा है। महाभारत में &#8216;अहंकार&#8217; प्रधान है, जहाँ भाई-भाई के हक को छीनने की चेष्टा करता है। इसके विपरीत, रामचरितमानस &#8216;समर्पण&#8217; सिखाता है, जहाँ राम पिता के वचन के लिए राज्य छोड़ देते हैं और भरत अधिकार होने पर भी उसे स्वीकार नहीं करते।</p>
<p><strong>घर को शांतिपूर्ण बनाने हेतु हमें कुछ सूत्र अपनाने होंगे</strong></p>
<p>अधिकारों के बजाय कर्तव्यों को प्राथमिकता दें। वाणी में मर्यादा रखें, क्योंकि कटु वचन ही कलह की जड़ हैं। अपनों के लिए थोड़ा झुकना और त्याग करना सीखें।</p>
<p>यदि हर घर में रामचरितमानस के संस्कार होंगे, तो ईर्ष्या और विवाद के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा। ग्रंथ केवल अलमारी में न हों, बल्कि हमारे आचरण में हों। रिश्तों में &#8216;राम&#8217; जैसा धैर्य और &#8216;भरत&#8217; जैसा प्रेम ही घर को वास्तव में स्वर्ग बना सकता है।</p>
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		<title>विश्व परिवार दिवस पर विशेष आलेख : सिमटते रिश्ते, टूटते परिवार, बदलता परिवेश </title>
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		<pubDate>Fri, 15 May 2026 11:16:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मनुष्य सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि यदि कोई रही है, तो वह केवल नगरों का निर्माण, विज्ञान की प्रगति अथवा आर्थिक संपन्नता नहीं, अपितु परिवार नामक वह आत्मीय संस्था है। विश्व परिवार दिवस पर सुनील सुधाकर शास्त्री का यह आलेख&#8230; मनुष्य सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि यदि कोई रही है, तो वह केवल नगरों का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मनुष्य सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि यदि कोई रही है, तो वह केवल नगरों का निर्माण, विज्ञान की प्रगति अथवा आर्थिक संपन्नता नहीं, अपितु परिवार नामक वह आत्मीय संस्था है। <span style="color: #ff0000">विश्व परिवार दिवस पर सुनील सुधाकर शास्त्री का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>मनुष्य सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि यदि कोई रही है, तो वह केवल नगरों का निर्माण, विज्ञान की प्रगति अथवा आर्थिक संपन्नता नहीं, अपितु परिवार नामक वह आत्मीय संस्था है, जिसने मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाकर संवेदनशीलता, सह-अस्तित्व और संस्कारों का पाठ पढ़ाया। परिवार केवल रक्त-संबंधों का समूह नहीं होता, वह मनुष्य के भीतर धड़कती हुई करुणा, सहनशीलता, समर्पण और अपनत्व की वह विराट पाठशाला है, जहाँ व्यक्ति “ मैं ” से “ हम ” तक की यात्रा करता है। किंतु आज के समय का सबसे बड़ा संकट यही है कि यह “हम” निरंतर सिमटता जा रहा है और “मैं” का अहंकार असहनीय विस्तार पा रहा है। परिणामस्वरूप रिश्ते सिकुड़ रहे हैं, परिवार टूट रहे हैं और मनुष्य भीतर से अत्यंत अकेला तथा रिक्त होता जा रहा है।</p>
<p>आज का व्यक्ति स्वयं को आधुनिकता के शिखर पर स्थापित मानता है, परंतु विडंबना यह है कि उसकी आत्मा संबंधों के दिवालियेपन से ग्रस्त होती जा रही है। जीवन का केंद्र अब परिवार नहीं, स्वार्थ बन चुका है। पहले जहाँ संतान को ईश्वर का आशीर्वाद माना जाता था, वहीं अब उसे आर्थिक बोझ और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधा के रूप में देखा जाने लगा है। सरकारी नीतियों, भौतिकवादी जीवन-दृष्टि और सीमित सुखों की लालसा ने मनुष्य को इस सीमा तक आत्मकेंद्रित बना दिया है कि वह एक या दो बच्चों तक सीमित हो गया है, और अनेक दंपत्ति तो संतान उत्पन्न ही नहीं करना चाहते। यह केवल जनसंख्या का प्रश्न नहीं, अपितु परिवार के प्रति घटते प्रेम और उत्तरदायित्व-बोध के लुप्त होने का संकेत है।</p>
<p>जब परिवार छोटे होते जाते हैं, तब रिश्तों का विराट वृक्ष भी सूखने लगता है। बुआ, फूफा, मौसी, मामा, चाचा, ताऊ, भाई-बहन जैसे आत्मीय संबंध धीरे-धीरे स्मृतियों की वस्तु बनते जा रहे हैं। आने वाली पीढ़ियाँ संभवतः केवल शब्दकोशों में इन रिश्तों का अर्थ खोजेंगी, क्योंकि उनके जीवन में इनका कोई जीवंत अनुभव नहीं होगा। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का महान भारतीय आदर्श, जिसने सम्पूर्ण विश्व को परिवार मानने की दृष्टि दी थी, आज अपने ही घरों में दम तोड़ता दिखाई दे रहा है।</p>
<p>आज मनुष्य का विश्वास संबंधों से उठता जा रहा है। वह केवल अपने छोटे-से निजी संसार में सीमित होकर जीना चाहता है। भाई-भाई के बीच सामंजस्य समाप्त हो रहा है। पिता-पुत्र एक ही घर में रहते हुए भी दो पृथक संसारों के निवासी बन चुके हैं। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि यदि किसी पिता का एकमात्र पुत्र भी है, तो वहाँ भी दो परिवार निर्मित हो जाते हैं—एक माता-पिता का और दूसरा पुत्र-पुत्रवधू का। यह केवल भौतिक विभाजन नहीं, बल्कि भावनात्मक विखंडन है।</p>
<p>समाज में ऐसे असंख्य उदाहरण दिखाई देते हैं जहाँ पाँच-पाँच पुत्र होते हुए भी माता-पिता वृद्धावस्था में उपेक्षा और भूख का जीवन जीने को विवश हैं। जिन हाथों ने संतान को चलना सिखाया, वही हाथ वृद्धावस्था में सहारे के लिए तरसते हैं। जिन आँखों ने बच्चों के भविष्य के लिए अपने सपनों का बलिदान किया, उन्हीं आँखों में आज उपेक्षा के आँसू तैरते दिखाई देते हैं। यह केवल परिवारों का संकट नहीं, बल्कि सभ्यता के पतन का संकेत है।</p>
<p>मनुष्य ने भौतिक सुखों की प्राप्ति तो कर ली, किंतु आत्मीयता खो दी। उसने विशाल भवन बना लिए, पर उनमें रहने वाले हृदय छोटे हो गए। उसने सुविधाएँ अर्जित कर लीं, परंतु सहनशीलता और सामंजस्य खो दिया। यही कारण है कि आज परिवारों में संवाद कम और विवाद अधिक हैं। छोटी-छोटी बातों पर संबंध टूट जाते हैं, क्योंकि त्याग और धैर्य की संस्कृति विलुप्त होती जा रही है।</p>
<p>यदि पारिवारिक मूल्यों को बचाना है, तो हमें केवल आर्थिक विकास की नहीं, भावनात्मक विकास की भी आवश्यकता होगी। हमें पुनः यह स्वीकार करना होगा कि परिवार केवल व्यक्तियों का समूह नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की आधारशिला है। समाज की स्थिरता संगठित परिवारों पर ही निर्भर करती है। अतः आवश्यक है कि हम अपनी प्रजनन दर के विषय में भी समग्र सामाजिक दृष्टि से विचार करें। केवल “हम दो, हमारे दो” अथवा “जितना है वही पर्याप्त है” जैसी सीमित सोच से ऊपर उठकर हमें यह समझना होगा कि स्वस्थ और विस्तृत पारिवारिक संरचना ही सामाजिक संतुलन की आधारभूमि है। यदि रिश्ते जीवित रहेंगे तभी समाज में आत्मीयता, सहयोग और सांस्कृतिक निरंतरता बनी रहेगी।</p>
<p>इसके साथ ही हमें स्वार्थ से हटकर समग्र राष्ट्र-चिंतन को अपनाना होगा। परिवार केवल निजी संस्था नहीं, राष्ट्र-निर्माण की प्रथम पाठशाला है। जिस समाज के परिवार टूट जाते हैं, वहाँ संस्कृति अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकती। अतः सहनशीलता, सामंजस्य और त्याग के माध्यम से परिवारों के विखंडन को रोकना होगा। माता-पिता के प्रति बहुमान और श्रद्धा की संस्कृति को पुनः जागृत करना होगा।</p>
<p>विद्यालयों में केवल विज्ञान और तकनीक की शिक्षा पर्याप्त नहीं है; वहाँ राम, लक्ष्मण और भरत श्रवण कुमार जैसे आदर्शों की शिक्षा भी अनिवार्य होनी चाहिए। त्याग, प्रेम, भाईचारा और पारिवारिक समर्पण के संस्कार यदि नई पीढ़ी को नहीं दिए गए, तो आने वाला समाज अत्यंत संवेदनहीन और अकेला होगा। भारतीय संस्कृति के मूल्यों का अध्ययन, अध्यापन और व्यापक प्रचार-प्रसार ही संगठित परिवारों की आत्मा को बचा सकता है।</p>
<p>यह समय आत्ममंथन का है। यदि संबंधों की ऊष्मा समाप्त हो गई, तो मनुष्य चाहे जितनी प्रगति कर ले, भीतर से वह सदैव निर्धन रहेगा। परिवारों का विघटन केवल चार दीवारों का टूटना नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा का बिखरना है। इसलिए आवश्यक है कि हम फिर से संबंधों की उस पवित्र धरती पर लौटें, जहाँ त्याग था, अपनापन था, सहनशीलता थी और एक-दूसरे के लिए जीने का आनंद था। क्योंकि अंततः मनुष्य को जीवन के अंतिम क्षणों में धन नहीं, संबंध ही सहारा देते हैं; और वही समाज जीवित रहता है, जिसके परिवार जीवित रहते हैं।</p>
<p>जोड़ते ,जुड़ते चलो, तो राष्ट्र का सम्मान होगा।</p>
<p>टूट कर बिखरे अगर, स्थान कूड़ादान होगा।।</p>
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		<title>गिरनार पर्वत जैनों का था है और रहेगा : जैन धर्म की तपस्या, त्याग और मोक्ष साधना का जीवंत प्रतीक है गिरनारजी  </title>
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		<pubDate>Thu, 14 May 2026 13:58:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आस्था की उन शिलाओं पर आज भी नेमिनाथ प्रभु के चरणों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। धरती पर कुछ स्थान ऐसे होते हैं जिन्हें केवल भूगोल से नहीं समझा जा सकता। वे इतिहास की पुस्तकों से भी बड़े होते हैं, क्योंकि वहाँ मनुष्य की आस्था सदियों तक साँस लेती रहती है। आज पढ़िए, ’डॉ. जयेन्द्र [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आस्था की उन शिलाओं पर आज भी नेमिनाथ प्रभु के चरणों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। धरती पर कुछ स्थान ऐसे होते हैं जिन्हें केवल भूगोल से नहीं समझा जा सकता। वे इतिहास की पुस्तकों से भी बड़े होते हैं, क्योंकि वहाँ मनुष्य की आस्था सदियों तक साँस लेती रहती है। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, ’डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’ चंदेरी का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>चंदेरी।</strong> आस्था की उन शिलाओं पर आज भी नेमिनाथ प्रभु के चरणों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। धरती पर कुछ स्थान ऐसे होते हैं जिन्हें केवल भूगोल से नहीं समझा जा सकता। वे इतिहास की पुस्तकों से भी बड़े होते हैं, क्योंकि वहाँ मनुष्य की आस्था सदियों तक साँस लेती रहती है। गिरनार पर्वत ऐसा ही एक पवित्र तीर्थ है। यह केवल पत्थरों का पहाड़ नहीं, बल्कि जैन धर्म की तपस्या, त्याग और मोक्ष साधना का जीवंत प्रतीक है।</p>
<p>जब प्रातःकाल की पहली किरण गिरनार की चोटियों को स्पर्श करती है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं इतिहास जाग उठता हो। हजारों सीढ़ियाँ चढ़ते हुए श्रद्धालुओं की थकी हुई साँसों में भी एक अद्भुत शांति दिखाई देती है। कोई वृद्ध अपने काँपते पैरों से ऊपर बढ़ रहा है, कोई माँ अपने बच्चों का हाथ थामे प्रभु के दर्शन की अभिलाषा लिए चल रही है, कोई साधु मौन तप में लीन है। इन सबके बीच गिरनार केवल पर्वत नहीं रह जाता, वह आस्था का धड़कता हुआ हृदय बन जाता है।</p>
<p>भगवान नेमिनाथ की निर्वाण भूमि होने के कारण गिरनार जैन समाज के लिए अनंत श्रद्धा का केंद्र है। कहते हैं कि जब नेमिनाथ प्रभु ने जीवों की करुण पुकार सुनी थी, तब राजवैभव का त्याग कर उन्होंने वैराग्य का मार्ग चुना। उसी त्याग की स्मृति आज भी गिरनार की हवाओं में जीवित है। वहाँ की हर शिला मानो संयम का संदेश देती है।</p>
<p>इतिहास बदलते रहे, राजसत्ताएँ आती-जाती रहीं, किन्तु तीर्थों का महत्व कभी समाप्त नहीं हुआ। जिस स्थान पर पीढ़ियों ने माथा टेका हो, जहाँ अनगिनत साधुओं ने तप किया हो, जहाँ समाज ने अपने आँसू, विश्वास और भक्ति अर्पित की हो कृ उस स्थान का संबंध केवल भूमि से नहीं, आत्मा से हो जाता है। इसलिए जब जैन समाज यह कहता है कि “गिरनार पर्वत जैनों का था, है और रहेगा”, तब यह केवल अधिकार की घोषणा नहीं होती, यह अपनी सांस्कृतिक स्मृति और आध्यात्मिक विरासत की रक्षा का भाव होता है।</p>
<p>आज का समय दुर्भाग्य से ऐसा हो चला है, जहाँ धर्म और आस्था को भी विवादों के तराजू में तौला जाने लगा है। किन्तु समाज को यह समझना होगा कि तीर्थ केवल ईंट और पत्थर नहीं होते। वे मनुष्य की नैतिक चेतना के केंद्र होते हैं। गिरनार की यात्रा मनुष्य को विनम्र बनाती है। हजारों सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद जब कोई श्रद्धालु मंदिर के सामने पहुँचता है, तब उसका अहंकार स्वतः ही झुक जाता है। यही तीर्थ की शक्ति है।</p>
<p>मुंशी प्रेमचंद यदि आज होते, तो शायद वे गिरनार को किसी धार्मिक विवाद के रूप में नहीं देखते। वे उस गरीब यात्री की आँखों में झाँकते, जिसने जीवनभर की कमाई से एक बार इस तीर्थ की यात्रा की। वे उस वृद्ध माँ की थकान को महसूस करते, जिसने अपने पुत्र का हाथ पकड़कर प्रभु के दर्शन किए। वे उस साधारण मनुष्य की श्रद्धा को समझते, जिसके लिए गिरनार मोक्ष का मार्ग है।</p>
<p>समाज की सभ्यता केवल ऊँची इमारतों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपनी विरासत और भावनाओं का कितना सम्मान करता है। गिरनार जैन संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। उसकी रक्षा केवल जैन समाज का नहीं, बल्कि पूरे भारतीय सांस्कृतिक चेतना का दायित्व है।</p>
<p>आज भी गिरनार की वादियों में एक मौन संदेश गूँजता है-</p>
<p>“राज्य बदल सकते हैं, समय बदल सकता है,</p>
<p>किन्तु तप, त्याग और श्रद्धा की ज्योति कभी नहीं बुझती।</p>
<p>गिरनार उसी अमर ज्योति का नाम है।</p>
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		<title>सम्राट से श्रमण तक चन्द्रगुप्त मौर्य: श्रवणबेलगोला और मौन तपस्या की अमर गाथा’ </title>
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		<pubDate>Thu, 14 May 2026 07:43:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारत के इतिहास में अनेक सम्राट हुए, जिन्होंने तलवार के बल पर साम्राज्य खड़े किए, सीमाएँ बढ़ाईं और विजय के ध्वज फहराए। किन्तु इतिहास में बहुत कम ऐसे सम्राट हुए, जिन्होंने सत्ता के शिखर से उतरकर आत्मा की शांति को अपनाया। चंद्रगुप्त मौर्य उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक हैं। आज पढ़िए, डॉ. जयेन्द्र जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारत के इतिहास में अनेक सम्राट हुए, जिन्होंने तलवार के बल पर साम्राज्य खड़े किए, सीमाएँ बढ़ाईं और विजय के ध्वज फहराए। किन्तु इतिहास में बहुत कम ऐसे सम्राट हुए, जिन्होंने सत्ता के शिखर से उतरकर आत्मा की शांति को अपनाया। चंद्रगुप्त मौर्य उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक हैं। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’ शास्त्री का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>चंदेरी।</strong> भारत के इतिहास में अनेक सम्राट हुए, जिन्होंने तलवार के बल पर साम्राज्य खड़े किए, सीमाएँ बढ़ाईं और विजय के ध्वज फहराए। किन्तु इतिहास में बहुत कम ऐसे सम्राट हुए, जिन्होंने सत्ता के शिखर से उतरकर आत्मा की शांति को अपनाया। चंद्रगुप्त मौर्य उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक हैं। पाटलिपुत्र के सिंहासन से लेकर श्रवणबेलगोला की शांत पहाड़ियों तक की उनकी यात्रा केवल एक राजा की यात्रा नहीं थी, वह मनुष्य के भीतर सत्ता से साधना की ओर बढ़ते आत्मसंघर्ष की यात्रा थी।</p>
<p><strong>जब साम्राज्य छोटा पड़ गया</strong></p>
<p>कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने सम्पूर्ण आर्यावर्त को एक सूत्र में बाँध दिया था।</p>
<p>उनके सामने यवन शक्तियाँ झुकीं, नन्द साम्राज्य समाप्त हुआ और मौर्य ध्वज पूरे भारत में लहराया। किन्तु जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न युद्धभूमि में नहीं, मनुष्य के भीतर खड़ा होता है। जैन परंपरा कहती है कि जब आचार्य भद्रबाहू ने भीषण अकाल की भविष्यवाणी की, तब चन्द्रगुप्त ने राजसिंहासन छोड़ दिया। कल्पना कीजिए कृ जिस व्यक्ति के एक आदेश पर लाखों सैनिक चल पड़ते हों, वह स्वयं नंगे पाँव एक मुनि के पीछे चल पड़ा होगा। यह केवल त्याग नहीं, यह आत्मा का जागरण था।</p>
<p><strong>चन्द्रगुप्त बसदि, मौन में खड़ा इतिहास</strong></p>
<p>चन्द्रगिरि पहाड़ी पर स्थित चंद्रगुप्त बसदि जैन स्थापत्य और इतिहास का अद्भुत संगम है। पत्थरों से निर्मित यह प्राचीन बसदि केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि वैराग्य की जीवित स्मृति प्रतीत होती है। यहाँ के स्तंभों पर उकेरी गई नक्काशी, शांत गर्भगृह और साधना का वातावरण आज भी आगंतुकों को सदियों पीछे ले जाता है।</p>
<p><strong>भद्रबाहु गुफा- जहाँ मौन बोलता है</strong></p>
<p>भद्रबाहू गुफा वह स्थान माना जाता है जहाँ आचार्य भद्रबाहु ने तपस्या की।</p>
<p>जैन परंपरा के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य ने भी यहीं संयम और ध्यान का जीवन जिया।</p>
<p>गुफा की सादगी मानो यह संदेश देती है कि आत्मा का प्रकाश वैभव से नहीं, त्याग से प्रकट होता है।</p>
<p><strong>शिलालेख और निशिधियाँ पत्थरों में जीवित स्मृतियाँ</strong></p>
<p>चंद्रगिरि पहाड़ी पर अनेक प्राचीन शिलालेख और निशिधि स्मारक स्थित हैं।</p>
<p>इन अभिलेखों में भद्रबाहु और चंद्रगुप्त की परम्परा के संकेत मिलते हैं। निशिधि स्तम्भ उन साधकों की स्मृति में बनाए जाते थे जिन्होंने संलेखना द्वारा शांतिपूर्वक देह त्याग किया। इन पत्थरों को देखकर लगता है मानो समय स्वयं ध्यानस्थ होकर बैठ गया हो।</p>
<p>भारत को यह कहानी फिर पढ़नी होगी। आज का युग वैभव, शक्ति और प्रदर्शन का युग बनता जा रहा है। ऐसे समय में चन्द्रगुप्त मौर्य की यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का दर्पण है। यह हमें बताती है कि- सत्ता अंतिम सत्य नहीं, वैराग्य पलायन नहीं, और आत्मसंयम कमजोरी नहीं होता। जब एक सम्राट संलेखना का मार्ग चुनता है, तब वह संसार को यह संदेश देता है कि आत्मा की शांति किसी भी साम्राज्य से बड़ी होती है। राज्य जीतने वाले बहुत हुए, पर स्वयं को जीतने वाले विरले होते हैं।</p>
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		<title>गिरनार की पुकार अभी नहीं जागे, तो कब जागोगे? : समाज के कर्णधारों से तीखे सवाल </title>
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		<pubDate>Wed, 29 Apr 2026 08:56:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वर्तमान में गिरनार जी तीर्थ को लेकर जो परिस्थितियाँ बनी हुई हैं, उन्हें देखकर हृदय द्रवित है। हम वह समाज हैं जो अपने धर्म, संस्कृति और प्राचीन तीर्थों पर गर्व करते हैं। लेखक अंशुल जैन &#8216;शास्त्री का आलेख पढ़िए, आलेख प्रस्तुति मनोज जैन नायक। वर्तमान में गिरनार जी तीर्थ को लेकर जो परिस्थितियाँ बनी हुई हैं, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वर्तमान में गिरनार जी तीर्थ को लेकर जो परिस्थितियाँ बनी हुई हैं, उन्हें देखकर हृदय द्रवित है। हम वह समाज हैं जो अपने धर्म, संस्कृति और प्राचीन तीर्थों पर गर्व करते हैं। <span style="color: #ff0000">लेखक अंशुल जैन &#8216;शास्त्री का आलेख पढ़िए, आलेख प्रस्तुति मनोज जैन नायक।</span></strong></p>
<hr />
<p>वर्तमान में गिरनार जी तीर्थ को लेकर जो परिस्थितियाँ बनी हुई हैं, उन्हें देखकर हृदय द्रवित है। हम वह समाज हैं जो अपने धर्म, संस्कृति और प्राचीन तीर्थों पर गर्व करते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि आज भगवान नेमिनाथ की पावन मोक्ष स्थली &#8216;गिरनार पर्वत&#8217; को बचाने के संघर्ष में हम खुद को कमजोर और असहाय महसूस कर रहे हैं। हम बड़े गर्व से कहते हैं कि जैन समाज सबसे शिक्षित है, आर्थिक रूप से संपन्न है और देश के विकास में सबसे अधिक टैक्स देता है। यह सब सच है, लेकिन जब अपने ही अस्तित्व और तीर्थ की रक्षा की बात आती है, तो यह संपन्नता मौन क्यों हो जाती है?</p>
<p>संस्थाओं की चुप्पी: बड़े-बड़े मंच, प्रभावशाली नेता और राष्ट्रीय संस्थाएं आज खामोश क्यों हैं?डिजिटल सक्रियता बनाम जमीनी हकीकत: हम केवल सोशल मीडिया पर &#8220;Save Girnar&#8221; लिखकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं, जबकि धरातल पर इससे कुछ नहीं बदलता।</p>
<p><strong>अंधभक्ति से ऊपर धर्म और आस्था</strong></p>
<p>राजनीतिक निष्ठा और धार्मिक आस्था के बीच चुनाव का समय आ गया है। जिस नेतृत्व पर हमने भरोसा किया, यदि वही हमारे तीर्थों के विरुद्ध खड़ा नजर आए, तो क्या हमारा चुप रहना सही है? समर्थन कभी अंधा नहीं होना चाहिए। जहाँ धर्म और सम्मान की बात हो, वहाँ सवाल पूछना स्वाभिमान का प्रतीक है।</p>
<p><strong>भावी पीढ़ी को क्या जवाब देंगे?</strong></p>
<p>आज हमें स्वयं से एक प्रश्न करना होगा—जब आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी कि गिरनार के संकट के समय हम कहाँ थे, तो क्या हम यह कहेंगे कि हमने तुम्हें अच्छी शिक्षा और धन तो दिया, लेकिन अपने तीर्थ नहीं बचा सके?</p>
<p><strong>अंतिम आह्वान: अभी नहीं तो कभी नहीं</strong></p>
<p>यदि हमारे पास ऐतिहासिक प्रमाण हैं और हमारा पक्ष सत्य है, तो आवाज़ उठाने में डर कैसा? याद रखिए:</p>
<p>आज गिरनार के लिए नहीं खड़े हुए, तो कल शिखर जी पर भी संकट गहराएगा। केवल &#8216;जैन&#8217; कहलाने से काम नहीं चलेगा, जैनत्व को आचरण और रक्षा में सिद्ध करना होगा। जागो समाज बंधुओं! कल इतिहास हमसे पूछेग—जब धर्म पर संकट था, तब तुम सक्षम होकर भी चुप क्यों थे?</p>
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		<title>विश्व धरोहर सूची में जैन धरोहरों को भी स्थान मिले : अद्वितीय और बेशकीमती हैं जैन पुरा संपदा </title>
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		<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 11:00:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विश्व धरोहर दिवस, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल दिवस कहा जाता है। प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मान्यूमेंट एंड साइट्स की ओर से 1982 में की गई और बाद में यूनेस्को ने इसे वैश्विक मान्यता दी। इस दिवस का उद्देश्य मानव सभ्यता की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>विश्व धरोहर दिवस, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल दिवस कहा जाता है। प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मान्यूमेंट एंड साइट्स की ओर से 1982 में की गई और बाद में यूनेस्को ने इसे वैश्विक मान्यता दी। इस दिवस का उद्देश्य मानव सभ्यता की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। विश्व धरोहर दिवस पर पढ़िए, निर्ग्रंथ सेंटर आफ आर्कियोलॉजी, लखनऊ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ.यतीश जैन, जबलपुर का यह आलेख। <span style="color: #ff0000">इसकी प्रस्तुति की राजेश जैन रागी ने। </span></strong></p>
<hr />
<p>विश्व धरोहर दिवस, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल दिवस कहा जाता है। प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मान्यूमेंट एंड साइट्स की ओर से 1982 में की गई और बाद में यूनेस्को ने इसे वैश्विक मान्यता दी। इस दिवस का उद्देश्य मानव सभ्यता की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। विश्व में लगभग 1200 के आसपास धरोहर स्थल सूचीबद्ध हैं, जबकि भारत में वर्तमान में 42 विश्व धरोहर स्थल हैं, जो हमारे देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। भारत की धरोहरों में जैन परंपरा का विशेष स्थान है। जैन धर्म अत्यंत प्राचीन है और इसके सिद्धांत अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्मसंयम, न केवल धार्मिक जीवन को बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को भी दिशा देते हैं। जैन धरोहर स्थल केवल पूजा के स्थान नहीं हैं, बल्कि वे तप, त्याग, ज्ञान और कला के केंद्र हैं। इन स्थलों की विशेषता यह है कि यहां आध्यात्मिकता और स्थापत्य कला का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। संपूर्ण देश में प्रत्येक राज्य में अति प्राचीन जैन तीर्थ स्थल एवं जैन धरोहर है, जिन्हें विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जा सकता है। इसके लिए सार्थक प्रयास किया जाना आवश्यक है। उदाहरण स्वरूप कुछ ही स्थलों के बारे में जानकारी दे रहा हूं जिन्हें आसानी से यूनेस्को के मापदंड में लिया जा सकता है। कर्नाटक में स्थित श्रवणबेलगोला जैन धरोहरों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां भगवान बाहुबली की 57 फीट ऊंची एकाश्म प्रतिमा स्थित है, जिसका निर्माण 981 ईस्वी में हुआ था। यह प्रतिमा पूरी तरह एक ही पत्थर से बनी है और यह त्याग, वैराग्य और आत्मविजय का प्रतीक है। हर 12 वर्ष में यहां महामस्तकाभिषेक का भव्य आयोजन होता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। राजस्थान के दिलवाड़ा जैन मंदिर जैन स्थापत्य कला के सर्वाेत्तम उदाहरणों में से एक हैं। 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच निर्मित इन मंदिरों की संगमरमर की नक्काशी इतनी सूक्ष्म और सुंदर है कि पत्थर भी जीवंत प्रतीत होता है। गुजरात का शत्रुंजय पहाड़ी (पालिताना) जैन धर्म का अत्यंत पवित्र स्थल है। यहां लगभग 863 से अधिक मंदिर एक ही पर्वत पर स्थित हैं। यह विश्व का सबसे बड़ा जैन मंदिर समूह माना जाता है। इन मंदिरों का निर्माण विभिन्न कालों में हुआ, विशेष रूप से 11वीं से 19वीं शताब्दी के बीच। यहां तक पहुंचने के लिए लगभग 3800 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, जो एक प्रकार की साधना का अनुभव कराती हैं। यह स्थल यह दर्शाता है कि जैन धर्म में तप और श्रम का कितना महत्व है। रणकपुर जैन मंदिर में 1444 स्तंभ हैं, और प्रत्येक स्तंभ की बनावट अलग-अलग है। यह स्थापत्य विज्ञान और कला का अद्भुत संगम है। गुजरात का गिरनार पर्वत जैन तीर्थ अत्यंत प्राचीन और पवित्र स्थल है, जहां 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ का संबंध माना जाता है। यहां लगभग 9999 सीढ़ियाँ हैं, जो साधना और आत्मअनुशासन का प्रतीक हैं।</p>
<p><strong>कंकाली टीला जैन कला और मूर्तिकला के प्रारंभिक विकास का साक्षी </strong></p>
<p>देशभर में जैन धर्म की प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों की बात करें तो मथुरा का कंकाली टीला का विशेष महत्व है। यहां से प्राप्त अवशेष पहली शताब्दी ईसा पूर्व से गुप्तकाल तक के हैं। यहां से जैन स्तूप, आयागपट्ट, मूर्तियां और अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जो यह प्रमाणित करते हैं कि मथुरा प्राचीन काल में जैन धर्म का प्रमुख केंद्र था। कंकाली टीला जैन कला और मूर्तिकला के प्रारंभिक विकास का साक्षी है। उड़ीसा में स्थित उदयगिरि खंडगिरि गुफाएँ जैन मुनियों की तपस्थली रही हैं। ये गुफाएँ दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में राजा खारवेल के समय निर्मित हुई थीं। इन गुफाओं में साधना और ध्यान के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। हाथीगुम्फा अभिलेख यहां का प्रमुख आकर्षण है, जो उस समय के इतिहास को स्पष्ट करता है। यह स्थल दर्शाता है कि जैन धर्म का विस्तार पूर्वी भारत तक व्यापक रूप से था। मध्यप्रदेश के ग्वालियर में स्थित गोपाचल पर्वत पर जैन प्रतिमाएं जैन शिल्पकला का अत्यंत भव्य उदाहरण हैं। यहां चट्टानों को काटकर 7वीं से 15वीं शताब्दी के बीच विशाल तीर्थंकर प्रतिमाएं बनाई गई हैं। कुछ प्रतिमाएं 50 फीट से भी अधिक ऊँची हैं। ये प्रतिमाएं न केवल कला का अद्भुत उदाहरण हैं, बल्कि वे जैन धर्म के प्रभाव और विस्तार को भी दर्शाती हैं।</p>
<p><strong>भारतीय संदर्भ में जैन धरोहरों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक</strong></p>
<p>मध्यप्रदेश का सोनागिरि जैन तीर्थ भी जैन सिद्ध क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ लगभग 100 से अधिक मंदिर स्थित हैं। यह स्थान मोक्षभूमि के रूप में जाना जाता है। इन सभी जैन धरोहरों का यदि समग्र रूप से अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि वे न्छम्ैब्व् के विश्व धरोहर मानकों के अनुरूप हैं। इनमें ऐतिहासिकता, स्थापत्य उत्कृष्टता, सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक महत्व जैसे सभी गुण मौजूद हैं। ये धरोहरें हजारों वर्षों से जीवित परंपरा का हिस्सा हैं, जहाँ आज भी लाखों लोग आस्था और श्रद्धा के साथ आते हैं। भारतीय संदर्भ में जैन धरोहरों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि ये केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि वे मानवता के लिए नैतिक और आध्यात्मिक संदेश भी देती हैं। अहिंसा और संयम जैसे सिद्धांत आज के वैश्विक समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। यदि इन धरोहरों को उचित संरक्षण और वैश्विक पहचान मिले, तो यह न केवल जैन धर्म बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए लाभकारी होगा। विश्व धरोहर दिवस हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझें, उसका सम्मान करें और उसे सुरक्षित रखने का संकल्प लें। जैन धरोहरों के माध्यम से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची प्रगति केवल भौतिक विकास में नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति में भी निहित है। यदि हम इन धरोहरों को सहेजकर रखेंगे, तो हम अपने अतीत का सम्मान करते हुए भविष्य को सशक्त बना सकेंगे। यही इस दिवस का वास्तविक संदेश है।</p>
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		<title>जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का विशेष है महत्व : अक्षय तृतीया पर्व 19 अप्रैल को मनाया जाएगा  </title>
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		<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 10:58:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का स्थान अत्यंत उच्च, तपप्रधान और शास्त्रीय आधारों से प्रतिष्ठित है। यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं करता, बल्कि त्याग, संयम, आहार-विधि, तपश्चर्या और आत्मशुद्धि के सिद्धांतों को प्रत्यक्ष रूप में अभिव्यक्त करता है। विशेषतः प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के दीक्षा ग्रहण, दीर्घकालीन उपवास तथा प्रथम आहार [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का स्थान अत्यंत उच्च, तपप्रधान और शास्त्रीय आधारों से प्रतिष्ठित है। यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं करता, बल्कि त्याग, संयम, आहार-विधि, तपश्चर्या और आत्मशुद्धि के सिद्धांतों को प्रत्यक्ष रूप में अभिव्यक्त करता है। विशेषतः प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के दीक्षा ग्रहण, दीर्घकालीन उपवास तथा प्रथम आहार ग्रहण की घटना से यह दिवस गहराई से संबद्ध है। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, राजेश जैन रागी द्वारा प्रस्तुत डॉ.यतीश जैन का आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का स्थान अत्यंत उच्च, तपप्रधान और शास्त्रीय आधारों से प्रतिष्ठित है। यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं करता, बल्कि त्याग, संयम, आहार-विधि, तपश्चर्या और आत्मशुद्धि के सिद्धांतों को प्रत्यक्ष रूप में अभिव्यक्त करता है। विशेषतः प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के दीक्षा ग्रहण, दीर्घकालीन उपवास तथा प्रथम आहार ग्रहण की घटना से यह दिवस गहराई से संबद्ध है। जैन आगमिक परंपरा में वर्णित है कि भगवान ऋषभदेव ने जब राज्य, ऐश्वर्य और समस्त भौतिक संसाधनों का त्याग कर दीक्षा धारण की, तब वे पूर्ण वैराग्य के साथ तप और ध्यान में लीन होकर विहार करने लगे। उनके जीवन का यह चरण पूर्णतः परिग्रह-शून्यता, इन्द्रियनिग्रह और आत्मानुशासन का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने संसार से विमुख होकर आत्मा की शुद्धि के लिए कठोर साधना का मार्ग अपनाया। दीक्षा के बाद जब वे आहार ग्रहण हेतु निकले, तब उस समय समाज में साधुओं को आहार देने की विधि का अभाव था।</p>
<p>लोग श्रद्धा से प्रेरित होकर उन्हें विभिन्न भौतिक वस्तुएँ-जैसे स्वर्ण, रत्न, वस्त्र आदि अर्पित करते थे, परंतु वे इन्हें स्वीकार नहीं करते थे। कारण यह था कि मुनि जीवन में केवल निर्दाेष, जीवदया से युक्त, मर्यादित और उचित विधि से प्रदान किया गया आहार ही स्वीकार्य होता है। इस प्रकार भगवान ऋषभदेव ने निरंतर तेरह माह तक उपवास किया। यह तप केवल शारीरिक सहनशक्ति का नहीं, बल्कि मन, वचन और काया की पूर्ण शुद्धि का प्रतीक था। इस प्रसंग का अत्यंत विस्तृत वर्णन आदिपुराण तथा महापुराण में प्राप्त होता है। इन ग्रंथों में भगवान ऋषभदेव के इस दीर्घकालीन उपवास को असाधारण तप बताया गया है, जो कर्म-निर्जरा का सशक्त साधन है। तत्त्वार्थ सूत्र में प्रतिपादित सिद्धांत</p>
<p>“तपसा निर्जरा च”</p>
<p>इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि तप के द्वारा कर्मों का क्षय होता है और आत्मा शुद्ध होती है।</p>
<p><strong>वर्षीतप एक अत्यंत कठोर साधना है,</strong></p>
<p>तेरह माह के उपवास के पश्चात वह पावन अवसर आया जब हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस कुमार को जातिस्मरण ज्ञान की प्राप्ति हुई। इस ज्ञान के प्रभाव से उन्हें यह स्मरण हुआ कि साधुओं को किस प्रकार शुद्ध और विधिपूर्वक आहार प्रदान किया जाता है। उन्होंने भगवान ऋषभदेव को इक्षु रस अर्पित किया, जो पूर्णतः शुद्ध, अहिंसात्मक और मर्यादित आहार था। भगवान ने इसे स्वीकार किया और अपना प्रथम आहार ग्रहण किया। यही घटना इस पावन तिथि पर घटित हुई, जिससे यह दिवस विशेष महत्त्व का हो गया। “अक्षय” का अर्थ है जिसका क्षय न हो, जो अविनाशी हो। इस संदर्भ में यह पर्व केवल बाह्य पुण्य की प्राप्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मा की उस शुद्ध अवस्था का भी संकेत देता है जहाँ कर्मों का क्षय होकर आत्मा अपने शाश्वत स्वरूप को प्राप्त करती है। इस दिन किया गया तप, दान और स्वाध्याय दीर्घकालिक आध्यात्मिक फल प्रदान करता है। इस पर्व का गहरा संबंध वर्षीतप से भी है। वर्षीतप एक अत्यंत कठोर साधना है, जिसमें साधक एक वर्ष तक वैकल्पिक उपवास करता है। एक दिन उपवास और दूसरे दिन मर्यादित आहार। यह साधना भगवान ऋषभदेव के तेरह माह के उपवास की स्मृति में की जाती है। इसका समापन इसी दिन “पारण” के रूप में होता है, जिसमें साधक इक्षु रस या अन्य शुद्ध आहार ग्रहण करता है। यह केवल तप का अंत नहीं, बल्कि आत्मसंयम की दीर्घ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।</p>
<p><strong>यह घटना आहार-विधि की स्थापना का मूल आधार बनती है</strong></p>
<p>आहार-विधि की दृष्टि से यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैन परंपरा में आहार को केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं माना गया, बल्कि यह आत्मानुशासन और जीवदया से जुड़ा हुआ है। राजा श्रेयांस कुमार द्वारा दिया गया इक्षु रस इस बात का प्रतीक है कि आहार शुद्ध भाव, सम्यक ज्ञान और उचित विधि से ही दिया जाना चाहिए। इस प्रकार यह घटना आहार-विधि की स्थापना का मूल आधार बनती है। दान के संदर्भ में भी यह प्रसंग अत्यंत शिक्षाप्रद है। यहाँ दान केवल वस्तु का नहीं, बल्कि भावना का महत्व दर्शाया गया है। श्रेयांस कुमार का दान इसलिए महान माना गया क्योंकि उसमें श्रद्धा, ज्ञान और करुणा का समन्वय था। जैन सिद्धांतों के अनुसार, सम्यक भाव से किया गया दान ही वास्तविक पुण्य का कारण बनता है। यह पर्व सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हमें सादगी, संयम और आत्मनियंत्रण का संदेश देता है। वर्तमान युग में, जहाँ भोग-विलास और उपभोग की प्रवृत्ति बढ़ रही है, यह पर्व हमें संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य बाहरी सुखों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और शुद्धि है।</p>
<p><strong>त्याग, तप, संयम और सम्यक आचरण ही आत्मोन्नति के वास्तविक साधन </strong></p>
<p>जैन दर्शन में आत्मा को अनंत ज्ञान, दर्शन और सुख का भंडार माना गया है, किन्तु कर्मों के बंधन के कारण यह स्वभाव प्रकट नहीं हो पाता। तप, संयम और साधना के माध्यम से इन कर्मों का क्षय किया जा सकता है। यह पर्व उसी मार्ग का स्मरण कराता है और प्रत्येक साधक को प्रेरित करता है कि वह आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर हो। अक्षय तृतीया का यह संदेश अत्यंत स्पष्ट है कि त्याग, तप, संयम और सम्यक आचरण ही आत्मोन्नति के वास्तविक साधन हैं। भगवान ऋषभदेव का आदर्श जीवन और राजा श्रेयांस की सम्यक भावना यह दर्शाती है कि जब ज्ञान, श्रद्धा और आचरण का समन्वय होता है, तभी धर्म का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। यही इस पावन तिथि का शाश्वत और अक्षय संदेश है, जो प्रत्येक युग में समान रूप से प्रासंगिक और प्रेरणादायक बना रहेगा।</p>
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		<title>भगवान महावीर, ‘महावीर’ क्यों? : जन-जन के महावीर, ‘महावीर’ नाम के पीछे की वास्तविकता </title>
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		<pubDate>Sun, 29 Mar 2026 11:55:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आज अधिकांश जनमानस यह नहीं जानता कि भगवान महावीर को “महावीर” क्यों कहा जाता है। सामान्यतः यह धारणा है कि उन्होंने युद्ध लड़े होंगे, असुरों और दुर्जनों का नाश किया होगा, जैसे रामभक्त हनुमान जी ने रावण की लंका का विध्वंस किया और भगवान राम की सहायता की, इसलिए उन्हें महावीर कहा गया। पढ़िए प्रशांत [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आज अधिकांश जनमानस यह नहीं जानता कि भगवान महावीर को “महावीर” क्यों कहा जाता है। सामान्यतः यह धारणा है कि उन्होंने युद्ध लड़े होंगे, असुरों और दुर्जनों का नाश किया होगा, जैसे रामभक्त हनुमान जी ने रावण की लंका का विध्वंस किया और भगवान राम की सहायता की, इसलिए उन्हें महावीर कहा गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए प्रशांत जैन का विशेष का आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>आज अधिकांश जनमानस यह नहीं जानता कि भगवान महावीर को “महावीर” क्यों कहा जाता है। सामान्यतः यह धारणा है कि उन्होंने युद्ध लड़े होंगे, असुरों और दुर्जनों का नाश किया होगा, जैसे रामभक्त हनुमान जी ने रावण की लंका का विध्वंस किया और भगवान राम की सहायता की, इसलिए उन्हें महावीर कहा गया।</p>
<p>किन्तु भगवान महावीर का जीवन इससे पूर्णतः भिन्न था। उन्होंने न तो कोई युद्ध लड़ा और न ही जीवन में कभी शस्त्र उठाया। वास्तव में दूसरों पर विजय प्राप्त करना सरल है, परंतु सबसे कठिन कार्य स्वयं पर विजय प्राप्त करना है।</p>
<p>संयम: अपने ही विरुद्ध एक महान युद्ध</p>
<p>भगवान महावीर ने अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर, प्राणी मात्र के कल्याण की भावना के साथ संसार को अहिंसा का महान संदेश दिया।</p>
<p>उन्होंने अपने जीवन में क्षमा, संयम, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह सहित दस धर्मों को धारण किया। जैन शास्त्र प्रवचनसार में कहा गया है—</p>
<p>“चारित्र खल्लु धम्मो”</p>
<p>अर्थात् चरित्र ही धर्म है।</p>
<p>भगवान महावीर ने ऐसा उच्च चरित्र धारण किया कि उनके संपर्क में आने वाला व्यक्ति आत्मिक रूप से “स्वस्थ” हो जाता है।</p>
<p>‘स्वास्थ्य’ का वास्तविक अर्थ</p>
<p>‘स्वास्थ्य’ का अर्थ है—‘स्व’ में स्थित होना।</p>
<p>भारतीय दर्शन में मोक्ष को परम पुरुषार्थ माना गया है, और मोक्ष का अर्थ है अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होना। जैन परंपरा में इसी को ‘स्वभाव’ कहा गया है।</p>
<p>चार कषाय: आत्मा के रोग</p>
<p>भगवान महावीर ने चार प्रमुख आंतरिक रोग बताए—</p>
<p>क्रोध</p>
<p>मान</p>
<p>माया</p>
<p>लोभ</p>
<p>इन चारों को ‘कषाय’ कहा गया है, क्योंकि ये आत्मा के शुद्ध स्वरूप को विकृत कर देते हैं। जो इन कषायों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही “जिन” कहलाता है और उसके अनुयायी “जैन”।</p>
<p>अहिंसा और राग-द्वेष का संबंध</p>
<p>जैन धर्म अहिंसा के लिए प्रसिद्ध है, किन्तु भगवान महावीर ने स्पष्ट किया कि हिंसा का मूल कारण राग और द्वेष हैं।</p>
<p>जहाँ राग-द्वेष है, वहीं हिंसा है।</p>
<p>यदि राग-द्वेष समाप्त हो जाएं, तो दूसरों को पीड़ा देने का प्रश्न ही नहीं उठता।</p>
<p>अनेकांत: सत्य का बहुआयामी स्वरूप</p>
<p>भगवान महावीर की परंपरा में ‘अनेकांत’ का अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत मिलता है, जिसका अर्थ है—सत्य बहुआयामी होता है।</p>
<p>निष्पक्षता, अपरिग्रह और अहिंसा—ये तीनों एक ही सत्य के विभिन्न रूप हैं। भगवान महावीर ने अपनी गहन साधना और कठोर तपस्या से जिस सत्य का साक्षात्कार किया, उसमें सबका हित निहित है, किसी का अहित नहीं।</p>
<p>‘जीओ और जीने दो’ का संदेश</p>
<p>भगवान महावीर का सबसे महान संदेश है—</p>
<p>“जीओ और जीने दो”</p>
<p>इसी संदेश, आत्मसंयम, अहिंसा और आत्मविजय के कारण उन्हें “महावीर” कहा जाता है—वह महावीर, जिसने संसार नहीं, बल्कि स्वयं को जीता।</p>
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		<title>महावीर जयंती पर दीक्षा और महावीर निर्वाण पर देह-निर्वाण : तप, त्याग और राष्ट्र चेतना के प्रेरक संत आचार्य श्री ज्ञानसागर जी </title>
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		<pubDate>Sun, 29 Mar 2026 08:51:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[खंदार क्षेत्र को साधना से तीर्थ बनाने वाले तपस्वी आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने विश्व हिंदू परिषद की सर्वधर्म यात्रा में दिल्ली दरवाजा पर ऐतिहासिक देशना देकर हजारों श्रद्धालुओं में राष्ट्रीय गौरव और धर्म चेतना का संचार किया। पढ़िए जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चन्देरी’ का विशेष आलेख भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और संतों का योगदान भारत की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>खंदार क्षेत्र को साधना से तीर्थ बनाने वाले तपस्वी आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने विश्व हिंदू परिषद की सर्वधर्म यात्रा में दिल्ली दरवाजा पर ऐतिहासिक देशना देकर हजारों श्रद्धालुओं में राष्ट्रीय गौरव और धर्म चेतना का संचार किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चन्देरी’ का विशेष आलेख</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और संतों का योगदान</strong></p>
<p>भारत की आध्यात्मिक परंपरा सदैव महान संतों और तपस्वियों की तपस्या से आलोकित रही है। जब-जब समाज को दिशा की आवश्यकता हुई, तब-तब संतों ने अपने त्याग, तप और ज्ञान से जनमानस को प्रेरित किया। दिगंबर जैन परंपरा के महान तपस्वी आचार्य श्री ज्ञानसागर जी का जीवन भी ऐसी ही प्रेरणादायक गाथा है, जिसमें धर्म, तपस्या, समाज जागरण और राष्ट्र चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।</p>
<p><strong>महावीर जयंती पर दीक्षा &#8211; एक अद्भुत संयोग</strong></p>
<p>उनके जीवन का एक अत्यंत विलक्षण संयोग यह रहा कि उन्होंने भगवान महावीर जयंती के पावन दिवस पर दिगंबर मुनि दीक्षा ग्रहण की। जैन धर्म में यह दिन अत्यंत पवित्र माना जाता है, क्योंकि इसी दिन भगवान महावीर का जन्म हुआ था, जिन्होंने संसार को अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्मसंयम का महान संदेश दिया। ऐसे पावन दिवस पर दीक्षा लेना मानो भगवान महावीर के आदर्शों को अपने जीवन में पूर्ण रूप से आत्मसात करने का संकल्प था।</p>
<p><strong>तप, त्याग और सादगीपूर्ण जीवन</strong></p>
<p>आचार्य ज्ञानसागर जी ने दीक्षा के बाद अपने जीवन को पूर्णतः तप और साधना के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने वैराग्य, संयम और त्याग का ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया, जो आज भी साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था, परंतु उनकी आत्मिक शक्ति और आध्यात्मिक प्रभाव असाधारण था।</p>
<p><strong>खंदार क्षेत्र &#8211; निर्जन वन से पावन तीर्थ तक की यात्रा</strong></p>
<p>उनकी साधना का एक महत्वपूर्ण केंद्र बुंदेलखंड की ऐतिहासिक नगरी चंदेरी के समीप स्थित पावन तीर्थ श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र खंदार जी रहा। आज यह स्थान जैन श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ है, परंतु एक समय ऐसा भी था जब यह क्षेत्र घने जंगलों और निर्जन वातावरण से घिरा हुआ था। चारों ओर ऊँचे वृक्ष, झाड़ियाँ और पथरीली भूमि थी। वहाँ सर्प, बिच्छू, तेंदुआ और अन्य जंगली जानवर विचरण करते थे। मधुमक्खियों के विशाल छत्ते भी भय का कारण बने रहते थे। सामान्य व्यक्ति के लिए वहाँ पहुँचना भी अत्यंत कठिन था, परंतु आचार्य ज्ञानसागर जी ने उसी निर्जन स्थान को अपनी साधना का केंद्र बना लिया।</p>
<p><strong>कठोर साधना और अडिग संकल्प</strong></p>
<p>उन्होंने वहाँ चातुर्मास कर उस क्षेत्र को धर्म साधना का केंद्र बना दिया। वर्षा ऋतु में उस क्षेत्र की स्थिति और भी विकट हो जाती थी। आसपास के डूब क्षेत्र जलमग्न हो जाते थे और पूरा स्थान पानी से भर जाता था। किन्तु गुरुदेव का संकल्प अडिग था। जब चारों ओर जलभराव हो जाता था, तब भी वे एक छोटे से ऊँचे स्थान पर बैठकर ध्यान और तप में लीन रहते थे। वही स्थान उनका तपस्थल बन जाता था और उसी सीमित स्थान पर वे रात्रि विश्राम भी करते थे।</p>
<p><strong>प्रकृति भी हुई तपस्या से प्रभावित</strong></p>
<p>श्रद्धालुओं के अनुसार, जब गुरुदेव ध्यान में लीन होते थे, तब आसपास के जंगलों से तेंदुआ, सर्प और अन्य वन्य जीव भी उनके समीप आकर शांत भाव से बैठ जाते थे। यह दृश्य अत्यंत अद्भुत होता था। ऐसा प्रतीत होता था मानो प्रकृति भी उस महान तपस्वी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर रही हो।</p>
<p><strong>धार्मिक केंद्र के रूप में खंदार का विकास</strong></p>
<p>आचार्य ज्ञानसागर जी की तपस्या और प्रेरणा के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे उस निर्जन क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियाँ प्रारंभ हुईं। लोगों का भय दूर हुआ और श्रद्धालुओं का आगमन बढ़ने लगा। उनके मार्गदर्शन और आशीर्वाद से वहाँ मंदिरों के निर्माण की आधारशिला रखी गई और धीरे-धीरे वह स्थान एक प्रसिद्ध जैन तीर्थ के रूप में विकसित हो गया। आज खंदार क्षेत्र की प्रतिष्ठा का मुख्य श्रेय आचार्य ज्ञानसागर जी को ही दिया जाता है।</p>
<p><strong>राष्ट्र चेतना और सामाजिक समर्पण</strong></p>
<p>आचार्य ज्ञानसागर जी का व्यक्तित्व केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं था। उनके भीतर समाज और राष्ट्र के प्रति भी गहरा समर्पण था। इसी कारण उनकी वाणी को विभिन्न धार्मिक और सामाजिक मंचों पर अत्यंत सम्मान के साथ सुना जाता था।</p>
<p><strong>दिल्ली दरवाजा पर ऐतिहासिक देशना</strong></p>
<p>विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित सर्वधर्म यात्रा के दौरान चंदेरी के ऐतिहासिक दिल्ली दरवाजा पर आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज का ऐतिहासिक प्रवचन हुआ। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु, नागरिक और विभिन्न समाजों के लोग उपस्थित थे। उनकी देशना में केवल धार्मिक उपदेश ही नहीं, बल्कि राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक गौरव और नैतिक जीवन का प्रेरक संदेश भी समाहित था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि धर्म का उद्देश्य केवल पूजा-अनुष्ठान नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर सत्य, अहिंसा, नैतिकता और राष्ट्रप्रेम की भावना को जागृत करना है।</p>
<p><strong>सर्वधर्म समभाव का अद्भुत उदाहरण</strong></p>
<p>चंदेरी नगर में उनके अनेक भक्त और शिष्य थे। प्रमुख श्रद्धालुओं में विनोद कठरया, कु. पद्म सिंह, कमलेश, हाथीशाह, मुनालाल और सुमन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। जैनेतर समाज से भी मजीद खान पठान और बाबू मुजाबर जैसे श्रद्धालुओं ने गुरुदेव का आशीर्वाद प्राप्त किया। यह दर्शाता है कि उनका व्यक्तित्व किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं था। उनकी करुणा और समत्व से सभी धर्मों के लोग प्रभावित होते थे।</p>
<p><strong>महावीर निर्वाण दिवस पर देह-निर्वाण</strong></p>
<p>आचार्य ज्ञानसागर जी के जीवन का एक और अद्भुत संयोग यह रहा कि जिस पावन पर्व महावीर जयंती पर उन्होंने दीक्षा ग्रहण की थी, उसी परंपरा से जुड़े महावीर निर्वाण दिवस पर उन्होंने देह-निर्वाण प्राप्त किया। यह संयोग उनके जीवन को और भी अधिक आध्यात्मिक और प्रेरणादायक बना देता है।</p>
<p><strong>प्रेरणादायक जीवन संदेश</strong></p>
<p>उनका जीवन यह संदेश देता है कि तप, संयम और आत्मबल से मनुष्य न केवल आत्मकल्याण कर सकता है, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। आज जब श्रद्धालु खंदार क्षेत्र के दर्शन करते हैं, तो उन्हें यह स्मरण अवश्य करना चाहिए कि इस पावन तीर्थ के पीछे एक महान तपस्वी की कठिन साधना, त्याग और आध्यात्मिक शक्ति का योगदान है। आचार्य ज्ञानसागर जी का जीवन यह सिद्ध करता है कि यदि संकल्प दृढ़ हो और आत्मबल प्रबल हो, तो निर्जन वन भी धर्म और आस्था के महान केंद्र बन सकते हैं।</p>
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		<title>भगवान ऋषभदेव द्वारा ब्राह्मी सुंदरी का विद्याध्ययन: भारत गौरव गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने समझाया विद्यादान का महत्व  </title>
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		<pubDate>Wed, 25 Feb 2026 09:36:51 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अयोध्या में अपने प्रवचन में कहा कि भगवान ऋषभदेव सिंहासन पर सुख से बैठे हुए थे कि उन्होंने अपना चित्त कला और विद्याओं के उपदेश में लगाया। उसी समय उनकी ब्राह्मी और सुंदरी दोनों पुत्रियां मांगलिक वेशभूषा धारणकर पिता के पास पहुंची और विनय से भगवान को प्रणाम किया। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अयोध्या में अपने प्रवचन में कहा कि भगवान ऋषभदेव सिंहासन पर सुख से बैठे हुए थे कि उन्होंने अपना चित्त कला और विद्याओं के उपदेश में लगाया। उसी समय उनकी ब्राह्मी और सुंदरी दोनों पुत्रियां मांगलिक वेशभूषा धारणकर पिता के पास पहुंची और विनय से भगवान को प्रणाम किया। <span style="color: #ff0000">अयोध्या से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>अयोध्या(उप्र)</strong>। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अयोध्या में अपने प्रवचन में कहा कि भगवान ऋषभदेव सिंहासन पर सुख से बैठे हुए थे कि उन्होंने अपना चित्त कला और विद्याओं के उपदेश में लगाया। उसी समय उनकी ब्राह्मी और सुंदरी दोनों पुत्रियां मांगलिक वेशभूषा धारणकर पिता के पास पहुंची और विनय से भगवान को प्रणाम किया। भगवान ने भी उन दोनों कन्याओं को आशीर्वाद देकर बड़े प्रेम से उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया। उनके मस्तक पर हाथ फेरा और पुत्रियों के साथ कुछ विनोद करने लगे, अनंतर बोले-हे पुत्रियों! तुम दोनों विद्या ग्रहण करने में प्रयत्न करो क्योंकि, विद्या ग्रहण करने का यही काल है। ऐसा कहकर बराबर उन्हें आशीर्वाद देकर भगवान ने अपने चित्त में स्थित श्रुतदेवता को आदर पूर्वक सुवर्ण के विस्तृत पट्टे पर स्थापित किया, फिर भगवान ने ‘सिद्धं नमः’ मंगलाचरण पूर्वक अपने दाहिने हाथ से ‘अ आ’ आदि वर्णमाला लिखकर ब्राह्मी को शुद्ध अक्षरावली लिखने का उपदेश दिया। जिसका नाम सिद्ध मातृ का है, जो स्वर व्यंजन के भेद से दो भेद रूप हैं और समस्त विद्याओं में पाई जाती है तथा भगवान ने अपने बायें हाथ से ‘इकाई दहाई’ आदि संख्या को लिखते हुए सुंदरी को अंकगणित लिखने का उपदेश दिया। वांग्मय के बिना न कोई शास्त्र है और न कोई कला है, इसलिए भगवान ने सबसे पहले उन पुत्रियों को वाङ्गय का उपदेश दिया था। व्याकरणशास्त्र, छंदशास्त्र और अलंकारशास्त्र इन तीनों के समूह को वांग्मय कहते हैं। भगवान द्वारा बनाया गया व्याकरणशास्त्र बहुत विस्तृत था। जिसमें सौ से अधिक अध्याय थे। भगवान ने सबसे प्रथम ब्राह्मी कन्या को वर्णमालाएं पढ़ाई थीं। यही कारण है कि आज भी इसे ब्राह्मी लिपि कहते हैं। पिता के अनुग्रह से ये दोनों कन्याएं समस्त विद्याओं को पढ़कर सरस्वती देवी के अवतार लेने के लिए पात्रता को प्राप्त हो गई थीं।</p>
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