मुरैना। बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री उदारसागर महाराज जी ने श्रद्धान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन दर्शन में श्रद्धा को सम्यक दर्शन का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। श्रद्धा केवल किसी व्यक्ति, स्थान या परिस्थिति के प्रति भावनात्मक लगाव का नाम नहीं है, बल्कि तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप पर दृढ़ विश्वास ही सच्चा श्रद्धान है। आचार्यश्री ने कहा कि ऐसी श्रद्धा होनी चाहिए जो परिस्थितियों के बदलने पर भी डगमगाए नहीं। जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां आती-जाती रहती हैं, लेकिन जिसने जिनेन्द्र भगवान के वीतराग स्वरूप और उनके द्वारा बताए गए सत्य मार्ग को समझ लिया, उसकी श्रद्धा इन परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस भगवान को हमने अपना आराध्य माना है, उनके प्रति हमारा विश्वास दृढ़ और अटूट होना चाहिए।

वाणी और मोक्षमार्ग के प्रति श्रद्धा भी अटूट हो

उन्होंने कहा कि जिनेन्द्र भगवान अन्यथावादी नहीं होते। उनके श्रीमुख से निकली वाणी सत्य, अहिंसा, अनेकांत और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाने वाली है। भगवान ने किसी व्यक्ति को अपना अनुयायी बनाने के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराने के लिए धर्म का उपदेश दिया है। इसलिए यदि हमने जिनेन्द्र भगवान को भगवान माना है तो उनके सिद्धांतों, वाणी और मोक्षमार्ग के प्रति हमारी श्रद्धा भी अटूट होनी चाहिए।आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि भगवान के सामने सिर झुका देना मात्र श्रद्धा नहीं है। मंदिर में दर्शन कर लेना, पूजा-अभिषेक कर लेना और बाहर निकलकर अपने पुराने व्यवहार में लौट जाना धर्म की पूर्णता नहीं है। श्रद्धा का वास्तविक प्रमाण हमारे आचरण में दिखाई देना चाहिए। यदि भगवान के दर्शन के बाद हमारे भीतर क्रोध कम हो, क्षमा बढ़े, लोभ का त्याग हो, अहंकार घटे और जीवों के प्रति करुणा उत्पन्न हो, तभी समझना चाहिए कि हमारी आराधना आत्मा को स्पर्श कर रही है।

आत्मचिंतन और साधना का पवित्र स्थान है मंदिर

उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में भगवान को प्रसन्न करने के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर के भगवान को प्रकट करने के लिए धर्म किया जाता है। जिनेन्द्र भगवान स्वयं सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर चुके हैं और उनका उपदेश हमें भी उसी दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसलिए श्रद्धा के साथ सम्यक् ज्ञान और सम्यक् आचरण को जीवन में उतारना आवश्यक है। आचार्यश्री ने कहा कि मंदिर केवल भवन नहीं है, वह आत्मचिंतन और साधना का पवित्र स्थान है। यहां प्रवेश करते समय मन में यह भावना होनी चाहिए कि कुछ समय के लिए संसार की चिंताओं को बाहर छोड़कर अपने भीतर की यात्रा करनी है। मंदिर में मर्यादा हो, मन में शांति हो और जिनेन्द्र भगवान के प्रति श्रद्धा अडिग हो, तभी हमारी धर्मआराधना सार्थक बनेगी।

मंदिर की मर्यादा भी धर्म का ही एक अंग : मुनिश्री उपशांत सागरजी

मुनिश्री उपशान्तसागर जी महाराज ने धर्मसभा में मंदिर एवं तीर्थक्षेत्र की मर्यादाओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि जीव शुभ भावनाओं को लेकर मंदिर में प्रवेश करता है। इसलिए मंदिर में प्रवेश से लेकर पूजा-अर्चना और बाहर निकलने तक प्रत्येक क्रिया में सावधानी, विनय और शुद्ध भाव होना चाहिए।उन्होंने कहा कि मंदिर में कहां बैठना है, किस प्रकार बैठना है, भगवान की प्रतिमा के सामने किस प्रकार व्यवहार करना है, इन छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखना चाहिए। मंदिर में अनावश्यक बातचीत, हंसी-मजाक, ऊंची आवाज में बोलना, क्रोध करना अथवा किसी प्रकार का अशांत व्यवहार करना उचित नहीं है। यदि कोई व्यक्ति मंदिर में आकर भी संसार की चर्चा में लगा हुआ है तो उसने मंदिर में प्रवेश तो किया, लेकिन अभी मंदिर के वातावरण को अपने भीतर प्रवेश नहीं करने दिया।

अपने भीतर के विकारों को पहचाने

मुनिश्री ने कहा कि मंदिर में प्रवेश करते समय केवल शरीर की बाहरी शुद्धि पर्याप्त नहीं है। मन की शुद्धि, वाणी की शुद्धि और भावों की निर्मलता भी उतनी ही आवश्यक है। यदि मन में किसी के प्रति द्वेष है, वाणी में कठोरता है और भीतर अहंकार भरा है, तो भगवान के सामने खड़े होकर हमें सबसे पहले अपने इन दोषों को पहचानने का प्रयास करना चाहिए।उन्होंने कहा कि मंदिर हमें मौन रहना, विनय करना, आत्मावलोकन करना और अपने भीतर के विकारों को पहचानना सिखाता है। भगवान की प्रतिमा के दर्शन करते समय यह भावना होनी चाहिए कि जिस वीतरागता को हम प्रतिमा में देख रहे हैं, उसी वीतरागता की दिशा में हमें भी आगे बढ़ना है।