सीकर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दंग की नसिया में धर्म सागर सभागृह में उत्तम संयम धर्म की विवेचना में मंगल उपदेश देते हुए कहा कि चार कषाय इंद्रियों पर नियंत्रण संयम धर्म है। विषय भोग दुखदाई आसक्ति है। उन्होंने कहा कि अभी आपने माताजी का प्राणी संयम और इंद्रीय संयम पर उपदेश श्रवण किया। आत्मा शरीर रूपी वाहन पर चारों गतियों में परिभ्रमण यात्रा कर रही है। नदी दो तट किनारों के बीच में बहती है नदी अनियंत्रित होने पर किनारा तोड़कर सर्वनाश करती है। मनुष्य जीवन में पांच इंद्रिय का संयम महत्वपूर्ण है, विषय विष है। संयम रत्न है विषय भोग चोर से इसकी रक्षा धर्म से की जाती है। आचार्यश्री ने कहा कि पांच महाव्रत को धारण करने, पालन करने, तीन गुप्ती धारण करने, चार कषाय का निग्रह मन वचन काय पांच इंद्रीय विजय को संयम कहते हैं।

वषय भोग दुख है, यही विपत्ति का मूल

डॉ. राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने मंगल उपदेश में आगे कहा कि संयम आंतरिक शक्तियों को विकसित करता है। जिस प्रकार वाहन को ब्रेक से, नदी को किनारे तट से नियंत्रित किया जाता है। उसी प्रकार आत्मा शरीर को भी संयम रूपी ब्रेक से नियंत्रित किया जाता है। संसार परिभ्रमण में हर गति में अपने पांचों इंद्रियों का उपभोग किया है। सभी पदार्थों को देखा है, सूंघा, चखा है। एक गाथा के माध्यम से आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि विषय भोग सार रहित, कष्ट दुख देने वाले हैं। विषय पुद्गल है, विषय भोग में आसक्ति अच्छी नहीं है। आप को हित अहित का भेद समझना जरूरी है। विषय भोग दुख है, यही विपत्ति का मूल है। खानपान में व्यसन और परिग्रह की चर्चा की आपको आवश्यक अनावश्यक का भेद समझना जरूरी है।

आपको भी छोटे-छोटे नियम लेने की प्रेरणा लेना चाहिए

संयम धर्म सुनने का नहीं ग्रहण करने का है। आचार्य परंपरा संयमित होकर बाल ब्रह्मचारी है। आचार्य श्री ने प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी के संघपति का जिक्र कर बताया कि संघपति जवेरी परिवार ने भी यात्रा कराने के बाद मुनि दीक्षा ली। एक साधु और एक श्राविका एक माह के 32 उपवास और अन्य साधु श्रावक-श्राविका दशलक्षण के 10 उपवास सीकर में कर रहे हैं। उनसे आपको भी छोटे-छोटे नियम लेने की प्रेरणा लेना चाहिए। संयम धर्म जीवन को धार्मिक बनाने का संदेश देता है, मृत्यु के भय से डॉक्टर के कहने पर आप वस्तु भोजन नहीं करते हैं किंतु साधुओं की आत्मा के हित की बात नहीं मानते हैं।

समाज ने अग्नि पर धूप क्षेपण किया

आचार्य श्री के उपदेश के पूर्व आर्यिका श्री देशना मति जी के उपदेश हुए। दोपहर को तत्वार्थ सूत्र में आचार्य श्री ने 8 कर्मों की विवेचना की। नगर के जिनालयों में अष्ट कर्म नाश के लिए सुगंध दशमी पर्व पर दिगम्बर समाज ने अग्नि पर धूप क्षेपण किया। रात्रि को महाआरती में हजारों श्रद्धालू जुलूस के माध्यम से शामिल होते हैं। उसके बाद सांस्कृतिक प्रतियोगिता होती हैं। दिनभर धार्मिक अनुष्ठान में सभी हर उम्र के शामिल होकर धर्म लाभ ले रहे हैं।