चंदेरी। रक्षाबंधन का पर्व भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और रक्षा-संकल्प का प्रतीक माना जाता है, लेकिन जैन परंपरा में इस पर्व का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व और भी व्यापक है। जैन समाज में रक्षाबंधन को सात सौ मुनिराजों की रक्षा की प्रेरणादायी स्मृति से जोड़कर देखा जाता है। यह पर्व त्याग, तप, संयम, धर्मनिष्ठा और साधु-संघ के प्रति श्रद्धा का संदेश देता है।

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जैन परंपरा में प्रचलित कथा के अनुसार हस्तिनापुर में आचार्य अकंपन के नेतृत्व में सात सौ मुनिराज वर्षायोग के लिए विराजमान थे। इसी दौरान राजा पद्मराय के मंत्री बलि और उसके भाइयों से संबंधित प्रसंग में मुनिराजों के सामने संकट उत्पन्न हुआ। परिस्थितियां अत्यंत कठिन थीं, लेकिन मुनिराज अपने तप, संयम और आत्मसाधना से विचलित नहीं हुए। कथा के अनुसार मुनिराज विष्णुकुमार ने अपने तपोबल से साधु-संघ की रक्षा की। इस प्रसंग ने जैन समाज की धार्मिक स्मृति में रक्षाबंधन को एक विशेष पहचान प्रदान की। यहां रक्षा का अर्थ केवल शरीर की सुरक्षा नहीं, बल्कि धर्म, संयम और साधना की रक्षा से है।

रक्षा का अर्थ बदला, संदेश हुआ व्यापक

जैन दर्शन की दृष्टि से यह प्रसंग आज के समाज के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है। रक्षाबंधन हमें यह स्मरण कराता है कि कमजोर, असहाय और धर्मनिष्ठ व्यक्ति की रक्षा करना केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य भी है। जैन आचार-विचार में अहिंसा, करुणा, क्षमा और अपरिग्रह को जीवन का आधार माना गया है। ऐसे में रक्षाबंधन का संदेश केवल भाई द्वारा बहन की रक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति मैत्री और करुणा की भावना तक पहुंचता है।

राखी का धागा बने धर्म-संकल्प

जैन समाज में रक्षाबंधन का पर्व इस भावना के साथ मनाया जाता है कि मनुष्य अपने जीवन में धर्म और सदाचार की रक्षा का संकल्प ले। राखी का छोटा-सा धागा व्यक्ति को यह याद दिलाता है कि जीवन में शक्ति का उपयोग संरक्षण के लिए होना चाहिए, अहंकार और उत्पीड़न के लिए नहीं। आज जब सामाजिक जीवन में स्वार्थ, क्रोध और वैमनस्य बढ़ते दिखाई देते हैं, तब सात सौ मुनिराजों की रक्षा का यह प्रसंग समाज को संयम, क्षमा और परस्पर सम्मान का संदेश देता है।

आत्मबल की परंपरा का स्मरण का पर्व

रक्षाबंधन इसलिए केवल कलाई पर बंधने वाला धागा नहीं, बल्कि धर्म और मानवता की रक्षा का संकल्प है। सात सौ मुनिराजों की स्मृति से जुड़ा यह पर्व जैन समाज को त्याग, तप और आत्मबल की उस परंपरा का स्मरण कराता है, जिसमें धर्म की रक्षा सबसे बड़ा दायित्व मानी गई है।