कुण्डलपुर। मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में मधुरता, प्रसन्नता और समृद्धि का वास्तविक आधार संग्रह नहीं, बल्कि देने की भावना है। जो व्यक्ति दूसरों के हित में अपनी संपत्ति, समय और सामर्थ्य का उपयोग करता है, उसका जीवन नदी के समान मधुर बनता है, जबकि केवल अपने लिए संग्रह करने वाला व्यक्ति समुद्र के समान खारेपन को प्राप्त करता है। धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि कभी इस बात पर विचार करना चाहिए कि निरंतर बहने वाली नदी का जल मीठा होता है, जबकि चारों ओर से जल अपने भीतर समेटने वाले समुद्र का पानी खारा होता है। नदी अपने जल को सभी के लिए प्रदान करती है। वह खेतों, जीव-जंतुओं और मानव जीवन को लाभ पहुंचाती हुई निरंतर आगे बढ़ती है। इसके विपरीत समुद्र सभी दिशाओं से आने वाले जल को अपने पास संग्रहित करता रहता है।
परोपकार के लिए अंश निकालने का संकल्प ले
उन्होंने कहा कि यही सिद्धांत मनुष्य के जीवन पर भी लागू होता है। जो व्यक्ति देता है, वह मधुरता को प्राप्त करता है और सभी का बन जाता है, लेकिन जो केवल अपने लिए संग्रह करता है और परिग्रह में बंधकर स्वयं तक सीमित रहता है, उसका जीवन खारा हो जाता है।
मुनि श्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी आय का कुछ अंश धर्म, समाजसेवा और परोपकार के लिए निकालने का संकल्प ले। यह आवश्यक नहीं कि दान की शुरुआत बड़ी राशि से ही की जाए। व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार आधा प्रतिशत, एक प्रतिशत अथवा दो प्रतिशत राशि भी नियमित रूप सेसेवा और परोपकार के कार्यों के लिए दे सकता है।
क्षमता के अनुसार अधिक राशि दान में लगाएं
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति एक रुपया कमाता है तो उसमें से एक पैसा देने की भावना विकसित करे। सौ रुपये कमाने पर एक रुपया और अधिक कमाई होने पर अपनी क्षमता के अनुसार अधिक राशि दान में लगाएं। महत्वपूर्ण राशि नहीं, बल्कि देने की भावना और उसकी निरंतरता है। जो व्यक्ति नियमित रूप से दूसरों के लिए देना प्रारंभ कर देता है, वह धीरे-धीरे महान दानवीर बन सकता है।
छटी शुरुआत बड़े परिवर्तन का कारण
मुनि श्री ने कहा कि अधिक सामर्थ्य रखने वाले लोग अधिक दान करें, यह श्रेष्ठ है, लेकिन सीमित आय वाले व्यक्ति को भी दान और सेवा से पीछे नहीं हटना चाहिए। छोटी शुरुआत भी समय के साथ बड़े परिवर्तन का कारण बनती है। शुभ भावना से किया गया दान व्यक्ति के जीवन में संतोष, उदारता और करुणा का विस्तार करता है।
बड़े बाबा का दरबार भरा रहता है
मुनि श्री ने बड़े बाबा के चरणों में उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए मंगलकामना करते हुए कहा कि सभी लोग जिस श्रेष्ठ भावना और उत्साह के साथ बड़े बाबा के चरणों में आए हैं, उनके जीवन में भी वैसी ही ऊंचाइयां और आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त हों। उन्होंने सभी के सुख, शांति, समृद्धि और धर्ममय जीवन की मंगल भावना व्यक्त की। मुनि श्री ने कहा बड़े बाबा के दरवाजे खुले नहीं कि जब तक बंद नहीं होते बड़े बाबा का दरबार भरा रहता है आने जाने वाले लगे रहते हैं। रक्षाबंधन के दिन दोपहर में अनुष्ठान करेंगे इस दिन 700 मुनियों का उपसर्ग दूर हुआ था उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन, भाव प्रदर्शित करने का अवसर है। पूजन करेंगे चाहे 700 श्रीफल रखो एक रखो हजार रखो लाख रखो सभी एक-एक परिवार त्यागी वृति सभी पर्व मनाएंगे कथा श्रवण होगी प्रवचन का सार भी मिलेगा पूजन आदि संपन्न होंगे।दिनभर सभी को धर्म ध्यान करना है। आने वाले दिनों में रक्षाबंधन पर्व, पाठशाला अधिवेशन, संस्कार शिविर आदि का लाभ सभी को मिलेगा।अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि कुण्डलपुर में विराजमान मुनि श्री समतासागर जी महाराज के प्रेरणादायी प्रवचनों से प्रतिदिन श्रद्धालु धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।








