इंदौर। नगर के अतिशयकारी दिगंबर जैन पार्श्वनाथ मंदिर, जबरी बाग नसिया जी में पयुर्षण पर्व के दौरान दशलक्षण पर्व को धार्मिक श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। चौथे दिन उत्तम शौच धर्म के दिन श्रावक-श्राविकाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में भगवान का कलश अभिषेक और शांतिधारा की। इस अवसर पर बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष, युवक-युवतियां मौजूद रहीं। चमत्कारी पार्श्वनाथ भगवान की दिव्य प्रतिमा का अभिषेक और शांतिधारा के लिए बोलियां लगाई गईं। इसका साधर्मी बंधुओं ने पुण्यार्जन किया। मंत्रोच्चार के साथ शांतिधारा की गई और श्रद्धालुओं ने अर्घ्य समर्पित किए। जबरी बाग नसिया जी में प्रतिदिन सुबह 7 बजे से 8.30 बजे तक नित्य, पूजन, अभिषेक और शांतिधारा चल रही है।

यह है जबरी बाग नसिया जी का इतिहास

यहां लगे शिलालेख के अनुसार इसका ’निर्माण काल भगवान महावीर निर्वाण संवत 2442 और विक्रम संवत 1972 अंकित है। श्रीमंत श्री तुकोजीराव होलकर बहादुर इंदौर नरेश के शासन काल में इसका निर्माण किया गया। शिलालेख में वर्णित इतिहास के अनुसार इसके निर्माणकर्ता गोत्रीय सेठ माणकचंद मगनीराम के वंशज सेठ स्वरूपचंद जी सुपुत्र दानवीर राय बहादुर सेठ हुकुमचंद जी ने इंदौर और छावनी के बीच परोपकार के लिए एक विशाल और मनोहर स्थान का निर्माण कराया। यहां पर इस परिसर में श्री दिगंबर पार्श्वनाथ जैन मंदिर, धर्मशाला, महाविद्यालय, छात्रालय, सरस्वती भवन आदि संस्थाएं स्थापित की गईं। इनके लिए अलग-अलग भवनों का निर्माण किया गया।

नामकरण का इतिहास

शुरू में अलग-अलग स्थान होने और नसिया शैली में बने होने के कारण यह स्थान नसिया के नाम से प्रसिद्ध था। बाद में सेठ साहब ने अपनी स्वर्गीय मातेश्वरी जबरीबाई के नाम पर इसका नाम जबरी बाग प्रसिद्ध किया। शिलालेख के नीचे इस पुण्य कार्य में लगी लागत और उसके संचालन के लिए बनाए गए स्थायी फंड का विवरण भी दिया है। श्री जैन मंदिर और मूर्ति प्रतिष्ठा में भवन लागत दो लाख रुपए स्थायी फंड 9 हजार रुपए अंकित है। धर्मशाला के भवन की लागत 69 हजार 791 रूपए और स्थायी फंड 13 हजार 500 रुपए है। महाविद्यालय और छात्रावास के भवन में लागत 96 हजार 585 रुपए स्थायी फंड 2 लाख रुपए अंकित है।

जबरी बाग प्रमुख अतिशयकारी तीर्थ है

जबरी बाग नसिया जी सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि 100 साल से भी पहले रायबहादुर कस्तूरचंद ने शिक्षा, धर्मशाला और धर्म के उद्देश्य से बसाई गई एक पूरी परोपकारी नगरी थी, जो आज इंदौर के जैन समाज का प्रमुख अतिशयकारी तीर्थ है।