डॉ. विनोद शर्मा अपनी पुस्तक मस्तिष्क विज्ञान और पढाई आसान में कहते है-‘हमारे दिमाग का सबसे महत्वपूर्ण काम है सूचनाओ को सही तरीके से एकत्रित करना और जरूरत पड़ने पर पुनः प्राप्त करना। जिसे हम री-कलेक्शन कहते है। इन्फॉर्मेशन को प्राप्त करना कहलाता है। याद करना यानी मेमोराइजेशन, दिमाग मे रखना कहलाता है-रिटेंशन और ‘पुनः प्राप्त करना यानी याद आना कहलाता है री-कलेक्शन। याद तो हम सब कुछ करते है, लेकिन सब कुछ याद आता नही है। क्योकि याद आना निर्भर करता है की दिमाग मे सूचना कहाँ और किस तरह से रखी गयी है। सूचना को अच्छी तरह से सही जगह पर रखने के लिए हमे एसोसिएशन की जरूरत पड़ती है। मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। पढ़िए इसके 36वें अर्थात अंतिम भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….
मस्तिष्क का विज्ञान
मस्तिष्क का विज्ञान यह है कि वह चार भागों में बँटा है। प्रत्येक भाग अलग-अलग कार्य करने में नियुक्त है। पहले हिस्से से तर्क बुद्धि उत्पन्न होती है। किसी भी सुने हुए या पढ़े हुए विषय को यह हिस्सा तर्क के माध्यम से सुनकर उस पर विचार विमर्श करता है। इस हिस्से का यदि सही उपयोग एक ही दिशा में लगातार होता रहे तो व्यक्ति बहुत बुद्धिमान बन जाता है। एक ही विषय में अर्जित ज्ञान को तर्क के माध्यम से और अधिक चिन्तनपरख बनाना इसी हिस्से का काम है। मस्तिष्क का दूसरा हिस्सा योजना बनाता है। विद्यार्थी जब तक पढ़ता है उसके इस हिस्से का उपयोग कम होता है। इस हिस्से का उपयोग तब ही अधिक होता है जब व्यक्ति किसी व्यवसाय या नौकरी के काम में लग जाता है। तीसरे हिस्से का काम चंचल वृत्ति पैदा करना है। चंचलता बढ़ने से पहले और दूसरे हिस्से की कार्य प्रणाली भी प्रभावित होती है। मोबाइल, इंटरनेट पर बैठकर कई घण्टों तक मनोरंजन करने वाले युवा विद्यार्थियों या बच्चों के लिए यह चंचलता बहुत हानिकारक होती है। मस्तिष्क के इस तीसरे हिस्से का अधिक प्रयोग मनोरंजन के साधनों से ही होता है। ये साधन ही काम, वासना, इच्छा, अनैतिक चरित्र की वृत्तियाँ बढ़ाते हैं। अधिक बातचीत इस हिस्से पर बहुत प्रभाव डालती है, जिससे चंचलता और बढ़ती है। चंचलता मन को सुख देती है, ऐसा आदमी को महसूस होता है। इस कारण से वह चंचलवृत्ति को और अधिक बढ़ाता चला जाता है। मस्तिष्क के इस हिस्से के अधिक क्रियाशील होने पर व्यक्ति विवेकशून्य और जिम्मेदारियों के प्रति बे-परवाह हो जाता है। मस्तिष्क का चौथा हिस्सा अन्तर्ज्ञान से सम्बन्धित है। अन्तर्ज्ञान उसे आध्यात्मिक बना देता है। प्रज्ञा का जागरण अन्तर्ज्ञान से ही होता है। इस हिस्से की क्रियाशीलता से आध्यात्मिक झुकाव बढ़ने लगता है। सुख और शान्ति का संचार होने लगता है। व्यक्ति अपने में सन्तुष्ट होता है।
इसलिए भगवान् महावीर ने प्रयत्नपूर्वक बोलने पर जोर डाला है। यत्न शब्द बहुअर्थीय है। इस यत्न शब्द से ही यह अर्थ ध्वनित होता है कि बोलने में जब यत्न लगता है तो व्यक्ति को कष्ट महसूस होगा। बोलने में कष्ट हो, फिर भी बोलना पड़े तो वह सही बोलना है।
भगवान् वर्द्धमान महावीर के इन छह सूत्रों को अपने जीवन में अपनाने वाला निश्चित ही एक दिन महावीर बन सकता है। व्याख्यान का कोई अन्त नहीं होता है किन्तु बुद्धिमान के लिए संकेत मात्र ही पर्याप्त होता है। यह लघु कृति समस्त प्राणियों की जीवन शैली को अहिंसक बना देने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।




