मुरैना/द्रोणगिरी। जब भी धर्म की बात आती है, व्यक्ति के मन में अनेक प्रश्न उठने लगते हैं—यह कैसे होगा? मुझसे कोई गलती हो गई तो क्या होगा? कहीं जीवन में कोई अनिष्ट तो नहीं हो जाएगा? कहीं कोई दुख न आ जाए? यहीं से धीरे-धीरे धर्म के स्थान पर धर्म का भय जन्म लेने लगता है।

जब भय मन में घर कर लेता है, तब व्यक्ति विवेक-बुद्धि को पीछे छोड़कर तरह-तरह के आडंबरों और अंधविश्वासों का सहारा लेने लगता है। कोई संतान की प्राप्ति के लिए मन्नत मांगता है कि मनोकामना पूरी होने पर मंदिर में नारियल चढ़ाएगा, तो कोई काला धागा बांधकर स्वयं को अनिष्ट से सुरक्षित मान लेता है। कई बार छोटी-छोटी घटनाओं को भी अनिष्ट से जोड़कर व्यक्ति भयभीत हो जाता है।

ऐसे में हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि यह धर्म है या केवल भय से उपजा हुआ विश्वास?वास्तविकता यह है कि धर्म में डर का कोई स्थान नहीं है। धर्म मनुष्य को भयभीत नहीं करता, बल्कि भय से मुक्त करता है। धर्म विवेक देता है, अंधविश्वास नहीं; आत्मविश्वास देता है, आशंका नहीं और सत्य का मार्ग दिखाता है, आडंबरों की ओर नहीं ले जाता।

धर्म के नाम पर यदि कोई व्यक्ति हमें केवल आडंबर, भय और दिखावे की ओर ले जा रहा है, तो हमें ठहरकर विचार करना चाहिए कि हमने धर्म को वास्तव में समझा है या केवल उसकी बाहरी क्रियाओं को पकड़ लिया है।

धर्म का अर्थ यह नहीं कि मनोकामना पूरी होने पर किसी को भेंट चढ़ाई जाए या ईश्वर के सामने अपनी इच्छाओं की शर्त रखी जाए। “यह कार्य हो जाए तो मैं यह करूंगा”—यह धर्म नहीं, बल्कि इच्छाओं और भय का लेन-देन बन जाता है।

धर्म आत्मा को भीतर से निर्मल करने की प्रक्रिया है। वह हमें अपने दोषों को पहचानने, उन्हें दूर करने और आत्मस्वरूप को समझने की प्रेरणा देता है। धर्म संसार में भटकाने वाली बाहरी क्रियाओं का नाम नहीं, बल्कि आत्मा से परमात्मा की ओर बढ़ने वाली यात्रा का नाम है।

यदि हम धर्म को सही अर्थों में समझ लें, तो हमारे भीतर भय के स्थान पर निर्भयता, आडंबर के स्थान पर आत्मचिंतन और अंधविश्वास के स्थान पर विवेक जागृत होगा।

इसलिए आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम धर्म से डरें, बल्कि धर्म को समझें। सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाए, उसके भय को दूर करे और उसे सत्य, संयम एवं आत्मचिंतन के मार्ग पर आगे बढ़ाए।