कुण्डलपुर, दमोह। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कुण्डलपुर में आयोजित धर्मसभा में कहा कि मनुष्य के जीवन में पक्षपात और अहंकार सत्य को देखने की क्षमता को समाप्त कर देते हैं। व्यक्ति को यह आग्रह नहीं रखना चाहिए कि जो मैं कह रहा हूं वही सत्य है, बल्कि उसकी दृष्टि यह होनी चाहिए कि जो सत्य है, मैं उसी को कह रहा हूं।
पक्षपात सत्य को बहा ले जाता है
मुनि श्री ने गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के भावों का उल्लेख करते हुए कहा कि “पक्षपात एक ऐसा जलप्रपात है, जिसमें सत्य की मिट्टी बह जाती है।” जिस प्रकार तेज बहाव में मिट्टी अपने स्थान से बह जाती है, उसी प्रकार पक्षपात की प्रवृत्ति व्यक्ति के भीतर से सत्य को बहा ले जाती है। इसलिए किसी व्यक्ति, विचार या परिस्थिति के प्रति अनावश्यक आग्रह के बजाय सत्य के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए।
‘मैं सही हूं’ और ‘जो सही है, वही कहूं’ में अंतर
मुनि श्री ने कहा कि “जो मैं कह रहा हूं, वही सही है” और “जो सही है, मैं उसी को कह रहा हूं”—इन दोनों विचारों में बहुत बड़ा अंतर है। पहले विचार में अहंकार और अपने मत के प्रति आग्रह है, जबकि दूसरे में सत्य के प्रति समर्पण और निष्पक्षता है। अपने विचारों को अंतिम सत्य मान लेने पर व्यक्ति के लिए सही बात को स्वीकार करना कठिन हो जाता है।
खंडन-मंडन में नष्ट होती है जीवन ऊर्जा
मुनि श्री ने कहा कि संसार का व्यक्ति अक्सर खंडन-मंडन की प्रवृत्ति में उलझा रहता है। कौन अच्छा है, कौन बुरा है, किसने क्या किया और किसने क्या नहीं किया—इन्हीं बातों में व्यक्ति अपनी ऊर्जा खर्च करता रहता है। स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने और दूसरों की अच्छाइयों को स्वीकार न करने से जीवन में अशांति पैदा होती है।
उन्होंने गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की पंक्तियां सुनाईं—
“खंडन-मंडन में लगा, निज का न ले स्वाद।
फूल महकता नीम का, किंतु कटुक हो स्वाद॥”
बाहरी आकर्षण से नहीं, व्यवहार से पहचान
मुनि श्री ने नीम के फूल का उदाहरण देते हुए कहा कि वह देखने में सुंदर और सुगंधित हो सकता है, लेकिन उसका स्वाद कड़वा होता है। इसी प्रकार बाहरी प्रभाव, वाणी और व्यक्तित्व से कोई व्यक्ति आकर्षक दिखाई दे सकता है, लेकिन वास्तविक पहचान उसके व्यवहार और विचारों के निकट आने पर होती है।
उन्होंने कहा कि जीवन में केवल प्रभावशाली दिखना पर्याप्त नहीं है। विचार और व्यवहार में मधुरता, आत्मीयता और सत्यनिष्ठा होना आवश्यक है।
आचार्य श्री की रचनाओं में जीवन के सूत्र
मुनि श्री ने कहा कि गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने जीवन और समाज के सूक्ष्म अनुभवों को दोहों, हाइकू, संस्कृत श्लोकों और काव्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से सरल ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी रचनाओं में जीवन, समाज, व्यवहार और आत्मकल्याण के गहरे सूत्र समाहित हैं।
दूसरों को परखने के बजाय स्वयं को पहचानें
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को दुनियादारी की अनावश्यक उठापटक में अपनी शक्तियों और विचारों को नष्ट नहीं करना चाहिए। यदि हम किसी से बेहतर स्थिति में हैं तो उसका उपयोग उसके मार्गदर्शन और सहयोग में करें। कौन सही है और कौन गलत है, इस निरंतर आलोचना-प्रत्यालोचना में उलझने से जीवन का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता।
उन्होंने प्रत्येक परिस्थिति में तटस्थ भाव और उद्देश्यपूर्ण दृष्टि अपनाने की प्रेरणा दी। दूसरों को समझने और परखने में पूरा जीवन लगाने के बजाय अपने भीतर झांकना चाहिए। मानसिक उलझनों और वैचारिक संघर्षों से ऊपर उठकर आत्मानुभव का स्वाद लेना ही आध्यात्मिक जीवन की वास्तविक दिशा है।
पका फल डाल पर अधिक समय नहीं टिकता
मुनि श्री ने प्रकृति का उदाहरण देते हुए गुरुवर की पंक्तियां सुनाईं—
“पके फल डाल पर टिक न सकें देर,
फिर क्यों न निकलता घर से देर-सवेर।”
उन्होंने कहा कि फल पकने के बाद अधिक समय तक डाल पर नहीं टिक सकता। इसी प्रकार जीवन में परिवर्तन भी प्रकृति का नियम है। मनुष्य आयु, पद, संपत्ति और संबंधों के साथ मोह एवं आसक्ति में बंधा रहता है, जबकि उसे समझना चाहिए कि संसार में कोई भी स्थिति स्थायी नहीं है।
परिवर्तन को सहजता से स्वीकार करें
मुनि श्री ने कहा कि जीवन की परिपक्वता केवल उम्र बढ़ने का नाम नहीं है। वास्तविक परिपक्वता तब आती है, जब व्यक्ति जीवन की वास्तविकताओं को समझते हुए आवश्यकता पड़ने पर मोह और आसक्ति से मुक्त होने की क्षमता विकसित करता है। परिवर्तन से डरने के बजाय उसे सहजता से स्वीकार करना चाहिए।
आत्मचिंतन ही आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग
मुनि श्री ने कहा कि जीवन का सार पक्षपात, अहंकार और खंडन-मंडन से ऊपर उठकर तटस्थता, आत्मचिंतन और आत्मानुभव की ओर बढ़ना है। बाहरी संसार को बदलने की अपेक्षा अपने भीतर की दृष्टि को निर्मल करना अधिक आवश्यक है। सत्य को स्वीकार करने की क्षमता, दूसरों के प्रति निष्पक्ष भाव और भीतर की शांति का अनुभव ही सच्ची आध्यात्मिक परिपक्वता है।
श्रद्धालुओं को मिल रहा आचार्य श्री के दर्शन का संदेश
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं कुण्डलपुर क्षेत्र प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि कुण्डलपुर में मुनि श्री समतासागर जी महाराज के प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जीवन-दर्शन, साहित्य एवं आत्मकल्याणकारी संदेशों को सरल रूप में समझने का अवसर मिल रहा है।








