सीकर। शरीर को खान-पान, आचार विचार संस्कृति, संस्कार से स्वस्थ रखना चाहिए क्योंकि, शरीर स्वस्थ रहेगा तो ही आप व्रत का पालन अतिचार रहित कर सकते हैं। यह प्रबोधन आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में दिया। उन्होंने कहा कि केवल मनुष्य गति में ही आत्मा को संयम वैराग्य धारण कर परमात्मा बना सकते हैं। आत्मा नश्वर है, आत्मा सिद्ध गति तक रहती है। परमात्मा बनने के बाद आत्मा का जन्म मरण का परिभ्रमण छूट जाता है। आचार्यश्री ने कहा कि सोलह कारण भावना के पर्व वर्ष में तीन बार आते हैं, यह पर्व वर्ष में तीन बार नहीं, पूरे वर्ष के 365 दिन प्रति समय भावना भाना चाहिए, यही आत्मा के लिए हितकारी है। मिथ्यात्व, मोह राग, द्वेष आत्मा की उन्नति नहीं होने देते हैं। भावना भव नाशिनी होती है। भावना से ही कल्याण का मार्ग मिलता है। हर समय हमारा लक्ष्य आत्मा की उन्नति होना चाहिए।
...व्रत में अतिचार दोष नहीं आना चाहिए।
यह मंगल देशना देते हुए आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने दंग की नसिया पारस भवन के आचार्य धर्म सागर सभागृह में कहा कि व्रत धारण करने से उन्नति होती है। व्रत भावना पूर्वक बिना दोष के करना चाहिए। सभी को आत्मा का स्वरूप नहीं भूलना चाहिए। जीवन में उपवास का बड़ा महत्व है उपवास से जीव आत्मा के नजदीक रहता है। सोमवार के विषय शीलव्रतेश्वनतीचार भावना की विवेचना में बताया कि आज की भावना शील, व्रत और अनतिचार का विश्लेषण करे तो शील और व्रत में अतिचार दोष नहीं आना चाहिए।
शरीर स्वस्थ रहेगा तो ही आप व्रत का पालन कर पाएंगे
डॉ राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने शील व्रत 7 प्रकार के 3 दिग, दंड ओर अनर्थ दंड व्रत की विस्तृत विवेचना की। चारों दिशा का बंधन करना दिग व्रत, मन ,वचन काय समीचीन पूर्वक व्रत उपवास में अतिचार दोष नहीं आना दंड व्रत ओर धार्मिक कार्य में अतिचार दोष आना अनर्थ दंड है। धर्म उपदेश से आत्मा में लगे कचरा रूपी कम नष्ट करना चाहिए। शरीर को खान-पान, आचार विचार संस्कृति ,संस्कार से स्वस्थ रखना चाहिए क्योंकि शरीर स्वस्थ रहेगा तो ही आप व्रत का पालन अतिचार रहित कर सकते हैं।
तीर्थंकरों की ध्वनि ही जिनधर्म है
आचार्य श्री के उपदेश के पूर्व आर्यिकाश्री पदमयश मति माताजी के प्रवचन हुए। अपने उपदेश में बताया कि भाद्रपद्र माह वर्ष में सबसे पवित्र माह है क्योंकि, जैन धर्म के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रमुख पर्व इसी भाद्रपद माह में आते हैं। धार्मिक कार्य के प्रभाव से पुण्य अर्जित कर सकते हैं। 16 कारण भावना से तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंध होता है। तीर्थंकरों की ध्वनि ही जिनधर्म है। सबसे उत्कृष्ट पुण्य सामग्री तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति है। जो केवल मनुष्य ही प्राप्त कर सकता है। आपने दर्शन विशुद्धि भावना,विनय संपन्नता भावना की भी संक्षिप्त में विवेचना की। पुण्यशाली परिवारों ने दीप प्रज्वलन कर आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की।







