वर्तमान में गिरनार जी तीर्थ को लेकर जो परिस्थितियाँ बनी हुई हैं, उन्हें देखकर हृदय द्रवित है। हम वह समाज हैं जो अपने धर्म, संस्कृति और प्राचीन तीर्थों पर गर्व करते हैं। लेखक अंशुल जैन 'शास्त्री का आलेख पढ़िए, आलेख प्रस्तुति मनोज जैन नायक।

वर्तमान में गिरनार जी तीर्थ को लेकर जो परिस्थितियाँ बनी हुई हैं, उन्हें देखकर हृदय द्रवित है। हम वह समाज हैं जो अपने धर्म, संस्कृति और प्राचीन तीर्थों पर गर्व करते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि आज भगवान नेमिनाथ की पावन मोक्ष स्थली 'गिरनार पर्वत' को बचाने के संघर्ष में हम खुद को कमजोर और असहाय महसूस कर रहे हैं। हम बड़े गर्व से कहते हैं कि जैन समाज सबसे शिक्षित है, आर्थिक रूप से संपन्न है और देश के विकास में सबसे अधिक टैक्स देता है। यह सब सच है, लेकिन जब अपने ही अस्तित्व और तीर्थ की रक्षा की बात आती है, तो यह संपन्नता मौन क्यों हो जाती है?

संस्थाओं की चुप्पी: बड़े-बड़े मंच, प्रभावशाली नेता और राष्ट्रीय संस्थाएं आज खामोश क्यों हैं?डिजिटल सक्रियता बनाम जमीनी हकीकत: हम केवल सोशल मीडिया पर "Save Girnar" लिखकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं, जबकि धरातल पर इससे कुछ नहीं बदलता।

अंधभक्ति से ऊपर धर्म और आस्था

राजनीतिक निष्ठा और धार्मिक आस्था के बीच चुनाव का समय आ गया है। जिस नेतृत्व पर हमने भरोसा किया, यदि वही हमारे तीर्थों के विरुद्ध खड़ा नजर आए, तो क्या हमारा चुप रहना सही है? समर्थन कभी अंधा नहीं होना चाहिए। जहाँ धर्म और सम्मान की बात हो, वहाँ सवाल पूछना स्वाभिमान का प्रतीक है।

भावी पीढ़ी को क्या जवाब देंगे?

आज हमें स्वयं से एक प्रश्न करना होगा—जब आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी कि गिरनार के संकट के समय हम कहाँ थे, तो क्या हम यह कहेंगे कि हमने तुम्हें अच्छी शिक्षा और धन तो दिया, लेकिन अपने तीर्थ नहीं बचा सके?

अंतिम आह्वान: अभी नहीं तो कभी नहीं

यदि हमारे पास ऐतिहासिक प्रमाण हैं और हमारा पक्ष सत्य है, तो आवाज़ उठाने में डर कैसा? याद रखिए:

आज गिरनार के लिए नहीं खड़े हुए, तो कल शिखर जी पर भी संकट गहराएगा। केवल 'जैन' कहलाने से काम नहीं चलेगा, जैनत्व को आचरण और रक्षा में सिद्ध करना होगा। जागो समाज बंधुओं! कल इतिहास हमसे पूछेग—जब धर्म पर संकट था, तब तुम सक्षम होकर भी चुप क्यों थे?