आज के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कोई भी सरकार या राजनीतिक पार्टी संख्या बल के आधार पर ही किसी जाति, समाज या समुदाय की बातों को अधिक तवज्जो देती है। पिछली जनगणना में जैन समाज के कई लोगों द्वारा अपनी धार्मिक पहचान के स्थान पर गोत्र का उल्लेख किया गया, जिसके कारण जैन समाज की वास्तविक संख्या का सही अनुमान सामने नहीं आ पाया
जनगणना में पहले ‘जैन’ लिखें, गोत्र बाद में
आनंद कासलीवाल ने कहा कि कोई भी राजनीतिक पार्टी तब तक आपके समाज की ताकत और प्रभाव को सही तरीके से नहीं समझ सकती, जब तक उसे यह पता न हो कि चुनाव में आपके समाज की वास्तविक संख्या कितनी है और आपका कितना प्रभाव है। यदि हम संख्या में कम दिखाई देंगे, तो राजनीतिक दल और जनप्रतिनिधि भी हमारी बात को उसी अनुपात में महत्व देंगे। इसलिए आने वाली 2027 की जनगणना में हम सबसे पहले अपनी धार्मिक पहचान ‘जैन’ लिखें और उसके बाद, जहां उसका प्रावधान हो, अपना गोत्र दर्ज करें। जब जैन समाज की वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों में सामने आएगी, तब हम राजनीतिक पार्टियों के सामने यह आंकड़ा रख सकेंगे कि हमारे समाज की चुनावों में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है और हमारा मत किसी चुनाव के परिणाम को प्रभावित करने की कितनी क्षमता रखता है। इससे जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों को हमारी समस्याओं और मांगों पर ध्यान देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
सरकारी योजनाओं और सुविधाओं के लिए भी सही संख्या जरूरी
केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा विभिन्न समुदायों के लिए योजनाएं और सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इन योजनाओं की आवश्यकता और पहुंच का आकलन करते समय जनसंख्या से संबंधित आंकड़े भी महत्वपूर्ण होते हैं। यदि किसी समुदाय की संख्या सरकारी रिकॉर्ड में कम दिखाई देगी, तो उसके लिए उपलब्ध संसाधनों और योजनाओं की आवश्यकता का आकलन भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए हमारा अधिकार है कि सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली योजनाओं और सेवाओं का अधिकतम लाभ समाज तक पहुंचे। हम देश के जिम्मेदार नागरिक हैं और करों के माध्यम से देश के विकास में अपना योगदान देते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकारी रिकॉर्ड में हमारी वास्तविक संख्या और पहचान सही रूप से दर्ज पिछली जनगणना की स्थिति को सुधारना जरूरी है। पिछली जनगणना में यदि हमारे समाज के लोगों ने अपनी धार्मिक पहचान के स्थान पर गोत्र का उल्लेख किया है, तो इससे जैन समाज की वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों में कम दिखाई दे सकती है। हो सकता है कि वास्तविकता इससे अलग हो। इसलिए उस वास्तविकता को सही रूप से सामने लाने के लिए आने वाली 2027 की जनगणना हमारे लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। इस बार हमें अपनी धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से ‘जैन’ दर्ज करानी चाहिए और गोत्र को अलग सामाजिक पहचान के रूप में दर्ज करना चाहिए, यदि जनगणना के प्रपत्र में उसका प्रावधान हो। जैन और हिंदू धर्म की स्वतंत्र पहचान को समझना आवश्यक है
देश में कुछ वर्गों या कुछ नेतृत्वकर्ताओं द्वारा हिंदू और जैन धर्म को एक ही धार्मिक पहचान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। जैन समाज को इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। जैन धर्म की अपनी स्वतंत्र धार्मिक परंपरा, दर्शन, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था, आचार-विचार और जीवन शैली है। जैन धर्म के सिद्धांत, तीर्थंकर परंपरा, अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह, कर्म सिद्धांत तथा साधु-साध्वी परंपरा इसकी विशिष्ट धार्मिक पहचान को स्पष्ट करते हैं। इसलिए जैन धर्म की स्वतंत्र धार्मिक पहचान को बनाए रखना जैन समाज की जिम्मेदारी है।
भारत में जैन समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसलिए हमें अपने अल्पसंख्यक अधिकारों और उनसे संबंधित कानूनी प्रावधानों के प्रति भी जागरूक रहना चाहिए।
हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक संपत्तियों की सुरक्षा
जब तक हमारे कानूनी अधिकार और हमारी धार्मिक पहचान सुरक्षित हैं, तब तक हमारे पास अपने तीर्थों, मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संस्थाओं तथा साधु-साध्वी परंपरा से जुड़े विषयों की रक्षा के लिए कानून का सहारा लेने के रास्ते उपलब्ध रहते हैं।
यदि भविष्य में जैन और हिंदू की स्वतंत्र धार्मिक पहचान को समाप्त करके दोनों को एक ही श्रेणी में रख दिया जाता है और इससे जैन समाज की वर्तमान अल्पसंख्यक स्थिति अथवा उससे जुड़े अधिकार प्रभावित होते हैं, तो जैन समाज के सामने अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक संपत्तियों और संस्थाओं के संरक्षण को लेकर नई कानूनी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। इसलिए आज से ही हमें अपने अधिकारों, अपनी धार्मिक पहचान और अपनी विरासत के प्रति जागरूक होना चाहिए।
समाज के प्रबुद्ध वर्ग को भी इस विषय पर विचार करना चाहिए
बहुत से प्रबुद्ध लोगों से चर्चा करने पर यह सामने आया है कि उन्हें यह जानकारी ही नहीं है कि जैन धर्म की अपनी स्वतंत्र धार्मिक पहचान है और वे जैन धर्म को हिंदू धर्म का ही एक हिस्सा मानते हैं। यह स्थिति हमारे लिए चिंता का विषय है। यदि हमारे अपने समाज के शिक्षित और प्रबुद्ध लोग ही अपनी धार्मिक पहचान को लेकर भ्रमित रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों के सामने स्थिति और अधिक कठिन हो सकती है। इसलिए हमें किसी धर्म या समाज के विरोध में खड़े होने की आवश्यकता नहीं है। हमें केवल अपनी पहचान को स्पष्ट रूप से समझने और सुरक्षित रखने की आवश्यकता है। जैन धर्म जैन धर्म है और उसकी अपनी स्वतंत्र धार्मिक पहचान है। इसलिए मैं जैन समाज के सभी बंधुओं से विशेष रूप से निवेदन करता हूं कि इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। यदि हमें अपनी जैन धर्म की पहचान, संस्कृति, तीर्थ, मंदिर, धार्मिक संस्थाएं, साधु-साध्वी परंपरा और सामाजिक विरासत को सुरक्षित रखना है, तो हमें सबसे पहले अपनी पहचान को स्पष्ट रखना होगा।
आने वाली 2027 की जनगणना में अपनी धार्मिक पहचान ‘जैन’ लिखें।
जैन लिखें-अपनी वास्तविक संख्या सामने लाएं।जैन लिखें- अपनी धार्मिक पहचान सुरक्षित रखें।
जैन लिखें-अपनी संस्कृति और परंपरा सुरक्षित रखें।
जैन लिखें-अपने तीर्थों और धार्मिक विरासत के संरक्षण के प्रति जागरूक बनें।
जैन लिखें- अपने अधिकारों के प्रति सजग रहें।
यह किसी के विरोध का अभियान नहीं है। यह अपनी धार्मिक पहचान, अपनी संस्कृति, अपने तीर्थों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए जागरूकता का प्रयास है। अतः सभी जैन बंधुओं से मेरा विनम्र निवेदन है-आने वाली जनगणना में अपनी धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से ‘जैन’ दर्ज कराएं और अपने समाज की वास्तविक संख्या को सामने लाएं।







