दिल्ली। दिल्ली में विराजित पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने धर्म सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि व्यक्ति जो भी करता है, उसका कोई-न-कोई उद्‌देश्य निहित रहता है। उद्‌देश्य के अनुसार ही कार्य होता है। जिसकी कथनी के अनुसार करनी अर्थात कार्य होता है वह श्रेष्ठ, सज्जन-पुरुष होता है। जिसकी कथनी व करनी एक होती है, उससे जन-जन प्रभावित होता है। जीवन में ऊँचाईयाँ पाना है, तो कथनी व करनी में एकता होना चाहिए। आप जो क्रिया कर रहे हो, यदि अपका उद्‌देश्य सही है, तो ही उसका फल श्रेष्ठ होगा।यदि आप बुरे-भावों से मंदिर भी आते हैं, तो आपका हित, आत्म-कल्याण नहीं होगा। आप नाम के लिए दान देते हैं, नाम के लिए तप करते हैं, तो आपके आत्म-हित में नहीं है।

उद्‌द्देश्य अनुसार निर्देश

व्यक्ति का जैसा उद्‌देश्य होता है, वह वैसा ही निर्देश करता है। वह इच्छा अनुसार ही सामग्री एकत्रित करता है। इच्छा अनुसार ही विचरण करता है। संसारी प्राणी अहोरात्र मात्र और मात्र अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ही प्रयत्न करता है। सज्जन-पुरुषों को कार्य करने के पूर्व विचार अवश्य ही करना चाहिए। हम जो कर रहे हैं, उसका फल क्या होगा।

सच्चा-हित क्या है?

धन-धरती एकत्रित कर लेना, कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। यह सब तो यहीं छूट जाएगा। मानव जीवन का सच्चा-हित इसी में है कि- स्वानुभव की प्राप्ति करके, आत्मानंद प्राप्त करे। तप, त्याग, संयम के द्वारा कर्मों से मुक्त होकर, शाश्वत सुख-स्वरूप परमात्म-पद प्राप्त करे।

गृहस्थी जाल, संबंधी जंजाल

यथार्थ में संसार के राग-रंग, मोह भाव ही हमारा शत्रु है। मकड़ी स्वयं ही जाल बुनती है और एक दिन उसी में उसकी मृत्यु हो जाती है। ऐसे ही मोही, संसारी-प्राणी की दुर्दशा है, उसके लिए गृहस्थी जाल की तरह है और संबंधी-जन जंजाल हैं। ये शांति पथ में बाधक हैं।

आत्म शांति का उपाय

आत्म शांति प्राप्त करना है, तो वैराग्य-पथ पर आगे बढ़ो। संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति प्राप्त करो। संसार, संबंध, शरीर एवं संसारिक सुखाभासों की क्षणभंगुरता पर चिंतन करो। रेत (बालू) को पेलने से कभी तेल नहीं निकलता है। कृत्रिम-पुष्पों में सुगंध नहीं आती है। इसी प्रकार संसारी भोगों को भोगने में शांति नहीं मिलती।