सीकर। पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी पारस भवन दंग की नसिया बजाज रोड सीकर में संघ सहित विराजित हैं। धर्मसभा में मंगलवार को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने श्रोता के गुण बताए। किन कार्यों को करने से सुख मिलता है और किन कार्यों से आत्मा संसार में परिभ्रमण करती है। कितने प्रकार के भय होते हैं? पांच इंद्रियों को विषय भोग में लगाने की बजाय पांच इंद्रियों का सदुपयोग करना चाहिए पैरों से चलकर देव शास्त्र गुरु के दर्शन विनयपूर्वक करना चाहिए। यह मंगल धर्मदेशना आचार्य धर्मसागर सभागृह में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दी। उन्होंने कहा कि नेत्रों से प्रभु के दर्शन कर हाथों से भगवान के अभिषेक पूजन करना चाहिए। हाथों से आहार दान सहित सभी दान देना चाहिए और जीभ से हित, मीत, प्रिय वचन बोलना चाहिए।

धर्मवाणी को ग्रहण कर चित्त में धारण करें

डॉ.राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने तीन मूर्ति की कथा के माध्यम से बताया कि तीनों तरह की मूर्ति एक समान बनी थी किंतु तीनों की कीमत अलग-अलग थी। जब परीक्षा की गई तो एक मूर्ति के कान में धागा डाला गया तो दूसरे कान से निकल गया। दूसरी मूर्ति में कान में धागा डाला तो मुंह से बाहर निकल गया तथा तीसरी मूर्ति में धागा कान से डाला गया तो वह बाहर नहीं निकला। इसी प्रकार श्रोता को भी धर्म की वाणी सुनकर ग्रहण करना चाहिए। चिंतन करना चाहिए। साधु परमेष्ठी ने भी धर्म को सुना समझा और आज हमारे साथ मंच पर ऊपर साथ बैठे हैं। उन्होंने धर्म का निवेश किया है। धर्म का निवेश पुण्य के रूप में होता है। यह निवेश अगले जन्म में भी काम आता है।

अरहंत और सिद्ध भगवान 18 दोष रहित होते हैं

आचार्य श्री के उपदेश के पूर्व मुनि श्री हितेन्द्र सागर जी ने सच्चे देव, शास्त्र गुरु का स्वरूप बताया। 7 प्रकार के भय की जानकारी दी। अरिहंत और सिद्ध भगवान के अतिशय और गुणों के बारे में बताया कि वह 18 दोष रहित होते हैं। जो चार प्रकार के दान देते हैं, लक्ष्मी उनकी दासी होती है। आदिनाथ भगवान को सीता के जीव ने आहार दान दिया था उसका उन्हें लाभ मिला। मुनिराज के चरणों के जल में जटायु ने लोट डुबकी लगाई तो उसका शरीर स्वर्णमयी हो गया। मुनि शिव ने सभी श्रावक-श्राविकाओं को आहार दान देने की प्रेरणा दी।