सदैव बाँयी करवट दोनों पैर पेट की ओर मुड़े हुए हो और सीधे या धनुषाकार लेटकर शयन करे। यह सोने का तरीका सर्वोत्तम है और उचित भी जिससे नींद भी अच्छी आयेगी और शारीरिक थकान भी दूर हो सकेगी। मानसिक और शारीरिक रुप से हम स्वस्थ है यह महसूस करेंगे। मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज का कॉलम Life Management निरंतरता लिए हुए है। पढ़िए इसके 23वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….

शयन का तरीका

असावधानीपूर्वक सोने से होने वाली हानियों से बच सकते हैं, यदि इन पर ध्यान दें तो -

- सोते समय सीधे मुँह ऊपर करके न लेटे। इस प्रकार सोने में हाथ हृदय (सीने) के ऊपर यदि रखे जाते हैं तो इससे हृदय गति रुकने का खतरा बना रहता है। बड़ी अजीब-सी घबराहट होती है और भय लगता है।

- पेट के बल भी न सोये, इससे कामुकता बढ़ती है।

- सदैव बाँयी करवट से शयन करे। दोनों पैर पेट की ओर मुड़े हुए भी हो सकते है। अथवा सीधे या धनुषाकार लेटे।

- डनलप जैसे अत्यधिक लचीले स्प्रिंग जैसे बिस्तर पर न सोयें।

- शयन से पूर्व लघुशंका से निवृत्त होकर हाथ और पैर धोकर व पोछकर ही बिस्तर पर जावें।

- टाईल्स और मार्बल के फर्श पर न सोवे।

- शयनकक्ष में बाहरी शुद्ध हवा आने-जाने का साधन अवश्य हो।

- नींद की गोली खाकर सोने की आदत कभी न डाले।

शयन कितने समय तक हो यह व्यक्ति की उम्र पर निर्भर करता है। बच्चा अधिक सोता है। 20-25 वर्ष की उम्र तक 7-8 घण्टे की अवधि शयन की रहती है। उसके बाद 45 वर्ष तक शयन की अवधि छह घण्टे रहती है। इसके बाद निद्रा कम होती जाती है। श्रम के अनुसार और शरीर की निरोगता से भी निद्रा में अन्तर पड़ता है। रोगी को नींद ज्यादा आती है। गरिष्ठ भोजन करने से भी नींद और आलस्य अधिक रहता है।

सोने का भी अपना एक विज्ञान (Science) है। सही ढंग से शयन करना चाहिए। यद्वा तद्वा (जिस किसी तरह से) सोने से अनेक शारीरिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। चूंकि एक व्यक्ति को औसतन 6-7 घण्टा सोना आवश्यक होता है, अतः अचेत-सी स्थिति में इतने लम्बे समय तक असावधानी से पड़े रहना शरीर के अंग-प्रत्यंगों को हानि पहुँचाता है। ब्लडप्रेशर और हृदयगति अवरोध तो उल्टे-सीधे सोने से ही होते हैं। इसके अलावा सर्वाइकल जैसे रोग का भी प्रमुख कारण अनुचित शयन है। यदि शयन की विधि को ध्यान रखा जावे तो पेट की, पीठ की, रीढ़ की, हृदय की और मस्तिष्क संबंधी सभी बीमारियों पर नियंत्रण रखा जा सकता है।

आजकल लोग स्पंज वाले गद्दे पर, डनलप के मुलायम बेड पर सोते हैं जिससे रीढ़ की हड्डी को आराम नहीं मिल पाता और पीठ या कमर के दर्द प्रारम्भ हो जाते हैं। बाद में डॉक्टर सलाह देते हैं कि आप लकड़ी के पाटे पर सोयें। भगवान् महावीर ने साधु को शयन करने के लिए मिट्टी, गोबर से लिपी भूमि, लकड़ी का पाटा या पाषाण शिला पर शयन का नियम बनाया जो पूर्णतः वैज्ञानिक और निरोगता का उपाय है। इसलिए या तो पहले से लकड़ी के तख्त पर श्रावक मुलायम चादर बिछाकर सोने का अभ्यास करे जिससे बाद में उसे दर्द का कर्ज न उठाना पड़े या फिर अत्यधिक स्पंज वाले बेड पर न सोवें।