इंदौर। कंचनबाग स्थित समवशरण दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन शुक्रवार को उत्तम आर्जव धर्म की आराधना भक्ति और उल्लास के साथ की गई। प्रातःकालीन अभिषेक, शांतिधारा और सामूहिक पूजन विधान आर्यिका सुदृढ़मति माताजी और आर्यिका सुलेखमति माताजी के सान्निध्य में संपन्न हुआ। यहां जारी संस्कार शिविर में माताजी की वाचना भी चल रही है। नित्य दोपहर में तत्वार्थ सूत्र का वाचन और शास्त्रों का अध्ययन-मनन कर स्वाध्याय किया जा रहा है। शुक्रवार को बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने विधान, पूजन में भाग लेकर पुण्यार्जन किया। मंदिर परिसर में धर्ममय वातावरण बना रहा।
उत्तम आर्जव धर्म: मन-वचन-काया की एकरूपता
प्रवचन की श्रृंखला में आर्यिका सुदृढ़मति माताजी ने उत्तम आर्जव धर्म की महत्ता समझाते हुए कहा कि उत्तम आर्जव धर्म छल, कपट और माया को त्यागकर अपनाया जाए तो जीवन का कल्याण निश्चित है। माताजी ने कहा कि आर्जव का अर्थ है सरलता, ऋजुता और मन-वचन-काया की एकरूपता। जैसे आज व्यक्ति के मन में कुछ और वचन में कुछ और कर्म में कुछ और होता है, वही मायाचार है। उत्तम आर्जव धर्म हमें सिखाता है कि भीतर-बाहर एक जैसा बनो। जो व्यक्ति छल-कपट से दूसरों को ठगता है, वह अंत में स्वयं ही ठगा जाता है, क्योंकि कर्म का लेखा-जोखा कभी मिटता नहीं।
अहंकार और मायाचार आत्मा के सबसे बड़े शत्रु
उन्होंने कहा कि सरलता कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। टेढ़े पेड़ पहले काटे जाते हैं, लेकिन सीधे पेड़ आकाश को छूते हैं। इसी प्रकार सरल हृदय वाला व्यक्ति ही प्रभु के करीब पहुंचता है। माया और कपट करने वाला व्यक्ति कितना भी पूजा-पाठ कर ले, उसका फल उसे नहीं मिलता। अहंकार और मायाचार आत्मा के सबसे बड़े शत्रु हैं। माताजी ने समझाया कि परिवार, व्यापार और समाज में अगर आर्जव धर्म आ जाए तो लड़ाई-झगड़े स्वतः समाप्त हो जाएं।
जहां से छल-कपट आता है, वहीं से दुख शुरू होता है
पति-पत्नी, भाई-भाई में जो छल-कपट आता है, वहीं से दुख शुरू होता है। उत्तम आर्जव धर्म अपनाने से मन निर्मल होता है, वाणी में मधुरता आती है और जीवन में शांति आती है। इसलिए दशलक्षण पर्व हमें यही संदेश देता है कि हम छल-कपट का त्याग कर सरल, सहज और निर्मल जीवन जिएं, तभी मोक्ष मार्ग प्रशस्त होगा।




