सीकर। राजकीय अतिथि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज बजाज रोड पारस भवन दंग की नसिया में 40 साधु ( 41 पिच्छी) सहित विराजित हैं।आचार्य श्री के सानिध्य में प्रतिदिन श्रीजी के पंचामृत अभिषेक पश्चात संस्कार शिविर अंतर्गत प्रतिदिन अनेक साधुओं द्वारा विभिन्न विषयों पर धार्मिक शिक्षण दिया जा रहा है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने आचार्य श्री धर्मसागर सभागृह में साध्य ,साधना ,श्रद्धा, शाश्वत सुख, सर्वज्ञ के समवशरण के प्रति समर्पण से सिद्धि सुनिश्चित सिद्ध अवस्था क्रम की विवेचना की। आचार्य श्री ने बताया कि देव भगवान वितरागी सर्वज्ञ, हितोपदेशी होने से श्रेष्ठ हैं। भगवान की देशना ही शास्त्र है। गुरु के रूप में आचार्य, उपाध्याय ,साधु परमेष्ठी विद्यमान है। यह संसार समुद्र से पार लगाने में सहायक मार्गदर्शक होते हैं।पंच परमेष्ठी श्रेष्ठ होकर परम पद पर स्थित है।
साध्य लक्ष्य सिद्ध अवस्था चाहते हैं वह भगवान के अनुरागी
अरिहंत, आचार्य, उपाध्याय ,साधु परमेष्ठी सिद्ध अवस्था के लिए प्रयत्नशील है। साध्य लक्ष्य सिद्ध अवस्था चाहते हैं, वह भगवान के अनुरागी होते हैं।वर्तमान में व्यक्ति राग ,द्वेष, मोह के कारण संसार परिभ्रमण कर रहा है। डॉ. राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि जब रागी व्यक्ति,विरागी संयमी बनता है,तब वह वितरागी बनने के मार्ग पर रत्नत्रय धर्म का सहारा लेता है। जिनका राग दूर हो गया वह वीतरागी है। पंचेेंद्रीय से सुख नहीं मिलता है। साध्य लक्ष्य के लिए आस्था, समर्पण से संयमी बन साधना करना होती हैं।
उपवास से कर्मों की निर्जरा
भगवान के समवशरण की धर्म देशना से सिद्धि शाश्वत सुख सिद्ध अवस्था प्राप्त होती हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने अपने प्रवचन में बताया कि उपवास से कर्मों की निर्जरा होती है। सच्चे देव शास्त्र गुरु के प्रति श्रद्धान नहीं करने के कारण व्यक्ति दुखी है। भगवान के दर्शन भाव ,चेतना , समर्पण से परिणामों की विशुद्धता सहित श्रद्धा भक्ति से करना चाहिए।बाहर से पधारे अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन किया गया।







